श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.15.35 
यथा मत्स्यादिरूपाणि धत्ते जह्याद् यथा नट: ।
भूभार: क्षपितो येन जहौ तच्च कलेवरम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
सर्वोच्च प्रभु ने उस शरीर को छोड़ दिया जिसे उन्होंने पृथ्वी के भार को कम करने के लिए व्यक्त किया था। एक जादूगर की तरह, वे विभिन्न शरीरों को धारण करने के लिए एक शरीर को त्यागते हैं, जैसे मछली अवतार और अन्य अवतार।
 
The Supreme Lord left the body which He had manifested to reduce the burden of the earth. He, like a magician, left one body to assume different bodies, such as the Matsya Avatar (the fish incarnation) and other incarnations.
तात्पर्य
सुरम सर्वोच्च पुरुषोत्तम देव न निराकार और न निर्गुण हैं। उनकी देह उनसे भिन्न नहीं है और इसीलिए उन्हें शाश्वत ज्ञान और आनंद के रूप में जाना जाता है। बृहद-वैष्णव तंत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि जो कोई भी भगवान कृष्ण के रूप को भौतिक ऊर्जा से बना हुआ मानता है, उसे हर तरह से बहिष्कृत किया जाना चाहिए। और यदि संयोग से ऐसे नास्तिक का चेहरा दिख जाए, तो उसे अपने कपड़ों के साथ नदी में कूदकर खुद को साफ करना चाहिए। भगवान को अमृत या अमर कहा गया है, क्योंकि उनका भौतिक शरीर नहीं है। इस तरह, भगवान का मरना या अपने शरीर का त्याग करना एक जादूगर की बाजीगरी की तरह है। जादूगर अपनी चाल से यह दिखाता है कि उसके टुकड़े कर दिए गए हैं, वह राख हो गया है या सम्मोहन के प्रभाव से वह बेहोश हो गया है, लेकिन ये सभी केवल झूठे शो हैं। वास्तव में वह जादूगर न तो राख हो जाता है और न ही उसके टुकड़े किए जाते हैं, न ही वह अपने जादुई प्रदर्शन के किसी भी चरण में मर जाता है या बेहोश होता है। इसी तरह, भगवान के पास अनंत विविधता के उनके शाश्वत रूप हैं, जिनमें से मछली अवतार भी एक है, जैसा कि इस ब्रह्मांड में प्रदर्शित किया गया था। क्योंकि अनगिनत ब्रह्मांड हैं, कहीं न कहीं मछली अवतार को निरंतर अपने मनोरंजन प्रदर्शित करने चाहिए। इस श्लोक में, विशेष शब्द धते ("शाश्वत रूप से स्वीकार किए गए," और शब्द धित्वा नहीं, "इस अवसर के लिए स्वीकार किए गए") का उपयोग किया गया है। विचार यह है कि भगवान मछली अवतार नहीं बनाते हैं; उनके पास शाश्वत रूप से ऐसा ही एक रूप है, और ऐसे अवतार की उपस्थिति और विलुप्ति विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति करती है। भगवद-गीता (7.24-25) में भगवान कहते हैं, "निराकारवादी सोचते हैं कि मेरा कोई रूप नहीं है, कि मैं निराकार हूं, लेकिन अब मैंने एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक रूप धारण किया है, और अब मैं प्रकट हूं। लेकिन ऐसे विचारक वास्तव में तीक्ष्ण बुद्धि के बिना हैं। वेदिक साहित्य में हालांकि वे अच्छे विद्वान हो सकते हैं, वे व्यावहारिक रूप से मेरी अचिंतनीय ऊर्जाओं और मेरे व्यक्तित्व के शाश्वत रूपों से अनजान हैं। कारण यह है कि मैं अपने रहस्यमयी पर्दे से भक्तों के सामने प्रकट न होने की शक्ति रखता हूं। इसलिए कम बुद्धिमान मूर्ख मेरे शाश्वत रूप से अनजान हैं, जिस पर कभी विजय नहीं पाई जा सकती और जो अजन्मा है।" पद्म पुराण में कहा गया है कि जो लोग ईर्ष्यालु होते हैं और हमेशा भगवान पर क्रोधित रहते हैं, वे भगवान के वास्तविक और शाश्वत रूप को जानने के अयोग्य हैं। भागवतम में भी कहा गया है कि भगवान उन लोगों के लिए वज्र की तरह प्रकट हुए जो पहलवान थे। भगवान द्वारा मारे जाने के समय, शिशुपाल उन्हें कृष्ण के रूप में नहीं देख सका, क्योंकि वह ब्रह्मज्योति की चकाचौंध से चकाचौंध था। इसलिए, असुरों द्वारा नियुक्त पहलवानों के लिए वज्र के रूप में भगवान की अस्थायी अभिव्यक्ति, या शिशुपाल के सामने भगवान की चकाचौंध भरी उपस्थिति, भगवान द्वारा त्याग दी गई थी, लेकिन एक जादूगर के रूप में भगवान शाश्वत रूप से विद्यमान हैं और किसी भी परिस्थिति में कभी भी उन पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती। ऐसे रूप केवल असुरों को अस्थायी रूप से दिखाए जाते हैं, और जब इस तरह की प्रदर्शनियों को वापस ले लिया जाता है, तो असुर सोचते हैं कि भगवान अब मौजूद नहीं हैं, जैसे मूर्ख दर्शक जादूगर को राख में जलते हुए या टुकड़े-टुकड़े होते हुए देखता है। निष्कर्ष यह है कि भगवान का कोई भौतिक शरीर नहीं है, और इसलिए उन्हें कभी भी अपने आध्यात्मिक शरीर द्वारा मारा या बदला नहीं जाना है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)