जलौकसां जले यद्वन्महान्तोऽदन्त्यणीयस: ।
दुर्बलान्बलिनो राजन्महान्तो बलिनो मिथ: ॥ २५ ॥
एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभु: ।
यदून्यदुभिरन्योन्यं भूभारान् सञ्जहार ह ॥ २६ ॥
अनुवाद
हे राजा, जैसे समुद्र में बड़े और बलवान जलचर, छोटे और कमज़ोर जलचरों को निगल लेते हैं, वैसे ही परमेश्वर ने धरती के बोझ को हल्का करने के लिए, कमज़ोर यादवों को मारने का काम बलशाली यादवों को सौंपा है, और छोटे यादवों को मारने का काम बड़े यादवों को सौंपा है।
O King, just as in the ocean, big and powerful aquatic creatures swallow small and weak aquatic creatures, in the same way, to lighten the burden of the earth, the Supreme Personality of Godhead has made the powerful Yadu fight to kill the weak Yadu, and the big Yadu fight to kill the small Yadu.
तात्पर्य
वस्तु जगत में अस्तित्व के लिए संघर्ष और सर्वाधिक उपयुक्त जीव का जीवित रहना ही नियम है क्योंकि वस्तु जगत में विभिन्न स्थितियों में बँधे जीवों में विभिन्नता होती है, जिसका कारण सभी की भौतिक संसाधनों पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा है। भौतिक प्रकृति पर प्रभूतता जमाने की यही मानसिकता ही बद्ध जीवन की मूल वजह है। और ऐसे नकली प्रभुओं को सहूलियत देने के लिए प्रभु की माया ऊर्जा ने हर जाति के जीवित प्राणियों में बलवान और कमजोर बनाकर स्थितिजीवी जीवों में विभिन्नता पैदा की है। भौतिक प्रकृति और सृष्टि पर प्रभुत्व जमाने की मानसिकता ने स्वाभाविक रूप से विभिन्नता और इसलिए अस्तित्व के लिए संघर्ष के नियम को जन्म दिया है। आध्यात्मिक जगत में ऐसी कोई विभिन्नता नहीं ना ही अस्तित्व के लिए कोई ऐसा संघर्ष है। आध्यात्मिक जगत में अस्तित्व के लिए कोई संघर्ष नहीं है क्योंकि वहाँ हर कोई शाश्वत रूप से विद्यमान रहता है। वहाँ कोई विभिन्नता नहीं है क्योंकि हर कोई परम प्रभु की सेवा करना चाहता है और कोई भी भोगी बनकर प्रभु की नकल नहीं करना चाहता है। जीवित प्राणियों समेत सभी के स्रष्टा होने के कारण, प्रभु वास्तव में हर उस वस्तु के स्वामी और उपभोक्ता हैं जो है, लेकिन, माया या भ्रम के प्रभाव से, भगवान के साथ यह शाश्वत रिश्ता भौतिक जगत में भुला दिया जाता है और इस कारण से जीवित प्राणी अस्तित्व के लिए संघर्ष और सबसे उपयुक्त के जीवित रहने के नियम से नियंत्रित होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥