श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.13.16 
युधिष्ठिरो लब्धराज्यो द‍ृष्ट्वा पौत्रं कुलन्धरम् ।
भ्रातृभिर्लोकपालाभैर्मुमुदे परया श्रिया ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
अपने राज्य को पुनः पाकर और एक ऐसे पौत्र के जन्म के साक्षी बनकर जो उनके परिवार की गौरवशाली परम्परा को आगे बढ़ाने में सक्षम था, महाराजा युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाइयों के सहयोग से शांतिपूर्वक शासन किया और असामान्य समृद्धि का उपभोग किया। उनके छोटे भाई कुशल प्रशासक थे।
 
Having regained his kingdom and having seen the birth of a grandson who was capable of carrying on the great tradition of his family, Maharaja Yudhisthira ruled peacefully and enjoyed unusual prosperity with the assistance of his younger brothers, who were all able administrators.
तात्पर्य
महाराज युधिष्ठिर और अर्जुन दोनों कुरुक्षेत्र के युद्ध के प्रारंभ से ही दुखी थे, लेकिन यद्यपि वे युद्ध में अपने ही लोगों को मारना नहीं चाहते थे, कर्तव्य के तौर पर इसे करना पड़ा, क्योंकि यह भगवान श्रीकृष्ण की सर्वोच्च इच्छा से नियोजित था। युद्ध के बाद, महाराज युधिष्ठिर इतने बड़े पैमाने पर हुई हत्याओं से दुखी थे। उनके बाद कुरु वंश को जारी रखने के लिए व्यावहारिक रूप से कोई नहीं बचा था, केवल पांडव। केवल एक शेष आशा उनकी बहू उत्तर की गर्भ में पल रहा बच्चा था, और उस पर भी अश्वत्थामा ने हमला किया था, लेकिन प्रभु की कृपा से वह बच्चा बच गया। इसलिए राज्य में सभी परेशान करने वाली परिस्थितियों के निपटारे और शांतिपूर्ण व्यवस्था की पुनर्स्थापना के बाद, और जीवित बच्चे परीक्षित को देखकर, महाराज युधिष्ठिर को एक मानव के रूप में कुछ राहत महसूस हुई, यद्यपि उनका भौतिक सुख, जो हमेशा भ्रामक और अस्थायी होता है, के लिए बहुत कम आकर्षण था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)