महात्मा विदुर ने पहले ही जीवन के त्यागी क्रम को अपना लिया था, और इसलिए वे भौतिक सुखों का आनंद लेने के लिए अपने पैतृक महल नहीं लौटे। उन्होंने अपनी दया से वह स्वीकार किया जो महाराज युधिष्ठिर द्वारा उन्हें दिया गया था, लेकिन महल में रहने का उद्देश्य उनके बड़े भाई धृतराष्ट्र को मुक्ति दिलाना था, जो बहुत अधिक भौतिक रूप से जुड़े हुए थे। महाराज युधिष्ठिर के साथ लड़ाई में धृतराष्ट्र ने अपना सारा राज्य और वंश खो दिया, और फिर भी, अपनी असहायता के कारण, वह महाराज युधिष्ठिर की दान और आतिथ्य स्वीकार करने में शर्म नहीं महसूस करते थे। महाराज युधिष्ठिर की ओर से अपने चाचा को उचित तरीके से बनाए रखना बिल्कुल सही था, लेकिन धृतराष्ट्र द्वारा इस तरह की उदार आतिथ्य स्वीकार करना बिल्कुल भी वांछनीय नहीं था। उन्होंने इसे स्वीकार किया क्योंकि उन्होंने सोचा कि कोई विकल्प नहीं था। विदुर विशेष रूप से धृतराष्ट्र को आत्मज्ञान के उच्च स्तर तक पहुँचाने के लिए और उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त करने में मदद करने के लिए आए थे। गिरे हुए लोगों को छुड़ाना प्रबुद्ध आत्माओं का कर्तव्य है, और विदुर उसी कारण से आए थे। लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान की बातें इतनी तरोताजा करने वाली होती हैं कि धृतराष्ट्र को निर्देश देते समय विदुर ने परिवार के सभी सदस्यों का ध्यान आकर्षित किया, और उन सभी ने धैर्यपूर्वक उन्हें सुनने में आनंद लिया। आध्यात्मिक साक्षात्कार का यही तरीका है। संदेश को ध्यान से सुना जाना चाहिए, और यदि किसी साक्षात्कृत आत्मा द्वारा बोला जाता है, तो यह वातानुकूलित आत्मा के निष्क्रिय हृदय पर कार्य करेगा। और लगातार सुनने से, व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार की पूर्ण अवस्था प्राप्त कर सकता है।
