श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.10.28 
नूनं व्रतस्‍नानहुतादिनेश्वर:
समर्चितो ह्यस्य गृहीतपाणिभि: ।
पिबन्ति या: सख्यधरामृतं मुहु-
र्व्रजस्त्रिय: सम्मुमुहुर्यदाशया: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे सखियों, जरा सोचो उनकी पत्नियों के बारे में, जिनका उसने हाथ थामा था। ब्रह्मांड के स्वामी का परम पूजन, यज्ञ, स्नान और व्रतों के द्वारा उन्होंने क्या पाया होगा, जिससे वे सब उनके होठों से अमृत पीती रहती हैं [चुंबन द्वारा]। ब्रजभूमि की लड़कियाँ तो ऐसी कृपा की कल्पना से ही बेहोश हो जाती होंगी।
 
हे सखियों, जरा सोचो उनकी पत्नियों के बारे में, जिनका उसने हाथ थामा था। ब्रह्मांड के स्वामी का परम पूजन, यज्ञ, स्नान और व्रतों के द्वारा उन्होंने क्या पाया होगा, जिससे वे सब उनके होठों से अमृत पीती रहती हैं [चुंबन द्वारा]। ब्रजभूमि की लड़कियाँ तो ऐसी कृपा की कल्पना से ही बेहोश हो जाती होंगी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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