श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.7.99 
एषां तु भाग्य-महिमाच्युत तावद् आस्ताम्
एकादशैव हि वयं बत भूरि-भागाः
एतद्-धृषीक-चषकैर् असकृत् पिबामः
शर्वादयो ’ङ्घ्र्य्-उदज-मध्व्-अमृतासवं ते
 
 
अनुवाद
यद्यपि इन वृन्दावनवासियों के सौभाग्य की सीमा अकल्पनीय है, फिर भी भगवान शिव सहित हम ग्यारह इन्द्रिय-देवता भी परम भाग्यशाली हैं, क्योंकि वृन्दावन के इन भक्तों की इन्द्रियाँ ही वे प्याले हैं, जिनसे हम बार-बार आपके चरणकमलों के मधुरूपी अमृतमयी मादक पेय का पान करते हैं।
 
Although the extent of the good fortune of these residents of Vrindavan is unimaginable, yet we eleven sense-gods, including Lord Shiva, are also extremely fortunate, because the senses of these devotees of Vrindavan are the cups from which we repeatedly drink the nectar-like intoxicating drink of honey from Your lotus feet.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas