श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.7.87 
श्री-जनमेजय उवाच
वैष्णवाग्र्य मया सन्ति
वैशम्पायनतः श्रुताः
एते श्लोकास् तदानीं च
कश्चिद् अर्थो ’वधारितः
 
 
अनुवाद
श्री जनमेजय ने जैमिनी ऋषि से कहा: हे वैष्णवश्रेष्ठ! मैंने वैशम्पायन से यही श्लोक सुने थे और उनसे मुझे कुछ ज्ञान प्राप्त हुआ था।
 
Sri Janamejaya said to Sage Jaimini: O best of Vaishnavs, I have heard these verses from Vaishampayana and have gained some knowledge from him.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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