श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 84-85
 
 
श्लोक  2.7.84-85 
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गवाम् एव तु गोलोको
दुरारोहा हि सा गतिः
स तु लोकस् त्वया कृष्ण
सीदमानः कृतात्मना

धृता धृतिमता धीर
निघ्नतोपद्रवान् गवाम् इति।
 
 
अनुवाद
"किन्तु गौओं के लोक, गोलोक, तक पहुँचना अत्यंत कठिन है। उस लोक पर आक्रमण हो रहा था—परन्तु हे कृष्ण, आपने, आप समर्थ, दृढ़ और बुद्धिमान हैं, गौओं के विरुद्ध सभी अत्याचारों का अंत करके उसे बचा लिया।"
 
"But it is extremely difficult to reach Goloka, the realm of cows. That realm was under attack—but You, O Krishna, You who are powerful, strong, and wise, saved it by putting an end to all atrocities against cows."
तात्पर्य
यहां गोलोक नाम का वर्णन किया गया है। गोलोक मुख्यतः गायों और उनके चरवाहों का निवासस्थान है। शायद ही कोई वहाँ जाने का विशेषाधिकार प्राप्त कर पाता है। स्वर्गलोक और ऋषियों के ऊंचे ग्रहों पर प्रवेश करना अपेक्षाकृत आसान है, जो उन पवित्र फलदायी कर्मियों के लिए खुले हैं जो अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित रख सकते हैं। कम आत्म-संयम वाले कर्मभी अभी भी निचले स्वर्गीय क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं, जिन्हें बिल-स्वर्ग और भौम-स्वर्ग कहा जाता है। इसके विपरीत, सर्वोच्च का संसार, वैकुण्ठ, केवल उन्हीं लोगों द्वारा प्राप्त किया जाता है जो भगवान के व्यक्तित्व पर मन को केंद्रित करने के वैष्णव अनुशासन को पूर्ण करते हैं, जो हमेशा आध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं, और जिन्हें भगवान से शुद्ध प्रेम है। फिर भी, भौतिक दुनिया के ऊंचे ग्रहों या वैकुण्ठ के आध्यात्मिक ग्रहों की तुलना में, गोलोक हर तरह से श्रेष्ठ है। यह सर्वोच्च गंतव्य है, जहाँ से कोई कभी नहीं लौटता है।

निश्चित रूप से गोलोक केवल गायों का घर नहीं है, क्योंकि उन गायों की देखभाल करने वाले गोप और गोपियों को साध्यास्तां पालयन्ति हि ("साध्य उसकी रक्षा करते हैं") शब्दों से पहले ही इंगित किया जा चुका है। पृथ्वी पर मथुरा जिले में गोकुल की तरह, भले ही उसका नाम गायों के नाम पर रखा गया हो, लेकिन वह ग्वालों का भी निवास स्थान है, आध्यात्मिक दुनिया में गोलोक भी कृष्ण के साथ विभिन्न संबंधों में भक्तों से आबाद है।

कृष्ण से इन प्रार्थनाओं का पाठ करते हुए, इंद्र स्वीकार करता है कि उसने कृष्ण के निवास की शांति भंग करने का प्रयास किया था। बेशक, गोलोक शाश्वत और हमेशा पूर्ण आनंदमय है, और वहां जाने की अनुमति प्राप्त प्रत्येक व्यक्ति सभी संकटों से मुक्त है। लेकिन इंद्र, गोलोक की महिमा से पूरी तरह अवगत नहीं होने के कारण, गलत तरीके से सोचता है कि उसने वहां अशांति पैदा की है। अपने सीमित दृष्टिकोण से अपने अपराधों का वर्णन करते हुए, वह कल्पना करता है कि पृथ्वी पर गोकुल पर हमला करके उसने सर्वोपरि आध्यात्मिक राज्य गोलोक में भी चिंता पैदा कर दी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)