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श्लोक 2.7.75  |
श्री-गोलोके निखिल-परमानन्द-पूरान्त्य-सीम-
गम्भीराब्धौ जननि गमनं साधय स्व-प्रयासैः
यस्मिंस् तास् ता विविध-रतयस् तेन नाथेन साकं
यात्रा-मात्रान् मधुर-मधुराः सन्ततं सङ्घटन्ते |
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| अनुवाद |
| हे प्रिय माँ, कृपया अपने प्रयासों से श्री गोलोक तक पहुँचने का प्रयास करें, वह गहन सागर जहाँ समस्त दिव्य आनंद की बाढ़ अपनी चरम सीमा को प्राप्त करती है। वहाँ जाकर ही आप उसी परम प्रभु के साथ सभी प्रकार के मधुर प्रेममय आदान-प्रदान का सदैव आनंद उठा पाएँगी। |
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| O dear Mother, please use your efforts to reach Sri Goloka, the deep ocean where the flood of all divine bliss reaches its peak. Only there will you be able to eternally enjoy all kinds of sweet loving exchanges with the same Supreme Lord. |
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