श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.7.38 
क्षेमं स-परिवारस्य
मम त्वद्-अनुभावतः
त्वत्-कृपाकृष्ट-चित्तो ’स्मि
नित्यं त्वद्-वर्त्म-वीक्षकः
 
 
अनुवाद
आपके प्रभाव से ही मेरा परिवार और मैं स्वस्थ हैं। आपकी कृपा से ही मेरा हृदय आपकी ओर आकर्षित है। मैं सदैव उस मार्ग की ओर देखता रहा हूँ जिस पर आप आएँगे।
 
It is because of your influence that my family and I are healthy. It is because of your grace that my heart is drawn to you. I have always looked forward to the path you will take.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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