| श्री बृहत् भागवतामृत » खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य » अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद) » श्लोक 28 |
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| | | | श्लोक 2.7.28  | चापोपम-भ्रू-युग-नर्तन-श्री-
संवर्धित-प्रेष्य-जनानुरागम्
श्रीमत्-सदा-स्मेर-मुखारविन्द-
शोभा-समाकृष्ट-मुनीन्द्र-चित्तम् | | | | | | अनुवाद | | उनकी भौहों का भव्य नृत्य, मानो धनुर्धरों के धनुष हों, उनके सेवकों की प्रेम-भावनाओं को पोषित करता था। और उनका सुन्दर, सदा मुस्कुराता हुआ कमल-सा मुख श्रेष्ठ मुनियों के हृदयों को आकर्षित करता था। | | | | The graceful dance of his eyebrows, like the bows of archers, nourished the affections of his attendants. And his beautiful, ever-smiling, lotus-like face captivated the hearts of the greatest sages. | | ✨ ai-generated | | |
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