श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  2.7.27 
स्वोत्प्रेक्षितापौर्विक-वेणु-गीत-
भङ्गी-सुधा-मोहित-विश्व-लोकम्
तिर्यग्-मनाग्-लोल-विलोक-लीला-
लङ्कार-संलालित-लोचनाब्जम्
 
 
अनुवाद
उनके द्वारा ही पूर्वाभासित उनके वंशी गान की अभूतपूर्व अलंकरणमयी ध्वनियाँ समस्त ब्रह्माण्ड को मदहोश कर देने वाली अमृत की भाँति मोहित कर रही थीं। और उनकी तिरछी और हल्की-सी दृष्टियों की चंचल क्रीड़ा उनके कमल-नेत्रों को मृदुलता से सुशोभित कर रही थी।
 
The unparalleled, ornamented sounds of His flute, foreseen by Himself, captivated the entire universe like intoxicating nectar. And the playful play of His slanted, slightly glanced glances gently adorned His lotus-like eyes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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