श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  2.7.14 
महत्-सङ्गम-माहात्म्यम्
एवैतत् परमाद्भुतम्
कृतार्थो येन विप्रो ’सौ
सद्यो ’भूत् तत्-स्वरूप-वत्
 
 
अनुवाद
किसी महान संत के संपर्क की ऐसी ही अद्भुत महिमा है। उस संपर्क से, इस ब्राह्मण को अचानक पूर्णता प्राप्त हुई और उसे अपनी शाश्वत पहचान का बोध हुआ।
 
Such is the wondrous glory of contact with a great saint. Through that contact, this brahmin suddenly attained perfection and realized his eternal identity.
तात्पर्य
आम तौर पर केवल भगवान के सबसे कुशल भक्त ही, भगवान की विशेष कृपा के लिए लंबे प्रयास के बाद, भगवान के लिए शुद्ध प्रेम प्राप्त करते हैं। फिर इस ब्राह्मण को प्रेम इतनी जल्दी कैसे प्राप्त हो गया? केवल एक शक्तिशाली संत के संपर्क में आने से। ब्राह्मण के अपने प्रयास अकेले व्यर्थ रहे होते। वैष्णव संगति के अद्वितीय वैभवों से ही उनकी सफलता संभव हुई थी, जो भौतिक बुद्धि के लिए अबाध है। श्रीमद-भागवतम (3.23.55) में श्री देवहूति कहती हैं:

संगो यः संसृतेर् हेतुरसत्सु विहितोऽधिया

स एव साधुषु कृतो निःसंगत्वाय कल्पते

"इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए संग निश्चित रूप से बंधन का मार्ग है। लेकिन ज्ञान के बिना भी, एक संत व्यक्ति के साथ निष्पादित वही प्रकार का संग, मुक्ति के मार्ग की ओर ले जाता है।"

जब कोई अज्ञानी व्यक्ति अन्य निम्न व्यक्तियों के साथ मिश्रित होता है, तो परिणाम भौतिक अस्तित्व में उलझाव, भोजन, पेय, यौन संबंध आदि का आनंद लेने में होता है। लेकिन शुद्ध आत्माओं की संगति, भले ही उसी अज्ञानता के साथ प्रवेश किया गया हो, किसी को निःसंग बनने में सक्षम बनाती है, दो तरह से मुक्त: भौतिकता से अलग और भगवान के शुद्ध प्रेम तक उन्नत। प्रेम वैराग्य का एक रूप है क्योंकि यह भगवान के व्यक्तित्व को प्रसन्न करने के प्रयास के अलावा अन्य सभी खोजों से दूर रहता है। इसलिए, जैसा कि योग-वासिष्ठ-रामायण में कहा गया है:

सदा सन्तोऽभिगम्यन्तव्या यद्यप्युपदिशंति न

या हि स्वैर-कथास्तेषां उपदेशा भवन्ति ते

शून्यमआपूर्ṇतामेति मृत्युर्अप्यमृतायते

आपत् संपदिवाभाति विद्वज्जनसमागमात

"सभी परिस्थितियों में, किसी को संत व्यक्तियों से संपर्क करना चाहिए। भले ही कोई शिक्षा प्राप्त न करे, फिर भी उनके साथ सहज संवाद मूल्यवान सबक प्रदान करता है। जब कोई वास्तविक ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों से संपर्क करता है, तो शून्यता पूर्णता से भर जाती है, मृत्यु अमर अमृत बन जाती है, और आपदाएँ अच्छे भाग्य की तरह लग सकती हैं।"

श्रीमद-भागवतम (3.7.19) में श्री विदुर कहते हैं:

यत्-सेवायां भगवतो

कूटस्थस्य मधु-द्विषः

रति-रासो भवेत्तीव्रः

पादयोर्व्यसनार्दनः

"आध्यात्मिक गुरु के चरणों की सेवा करने से, भगवान की सेवा में पारलौकिक आनंद विकसित होता है, जो मधु दानव का अविनाशी शत्रु है और जिसकी सेवा व्यक्ति की भौतिक कष्टों को दूर करती है।"

विदुर यहाँ अपने शिक्षा-गुरु मैत्रेय मुनि से बात कर रहे हैं। मैत्रेय की सेवा करके, विदुर सर्वोच्च भगवान की सेवा प्राप्त करने की अपेक्षा करते हैं, जिन्हें समझना कठिन है लेकिन उनकी सेवा उनके शुद्ध भक्तों की सेवा करके की जा सकती है। सर्वोच्च व्यक्ति कूट-स्थ है, जिसका अर्थ "अपरिवर्तनीय" और "अगम्य" दोनों है। वह इस अर्थ में भी कूट-स्थ है कि वह अन्न-कूट, भोजन का पहाड़, पेश किए जाने के लिए प्रसिद्ध है, जबकि गोवर्धन की उस विशेष चोटी पर खड़ा है। कृष्ण के चरणों में, राक्षस मधु का शत्रु, वैष्णवों का एक ईमानदार सेवक रति-रास प्राप्त कर सकता है, प्रेम का कभी न खत्म होने वाला त्योहार, जिससे इतना तीव्र (तीव्र) आनंद आता है कि कुछ भी उसे बाधित या बाधित नहीं कर सकता। भौतिक अस्तित्व विभिन्न दुखों से भरा है, लेकिन भगवान कृष्ण के चरणों (पादयोः) में भक्ति सेवा उन सभी को मिटा देती है (व्यसनार्दनः)। या यदि हम व्यसनार्दनः को संशोधित करने के लिए पादयोः लेते हैं, तो दो शब्दों का अर्थ एक साथ यह है "वह जो पैरों से महसूस किए गए दर्द को नष्ट करता है।" कृष्ण का रास-लीला मुख्य रूप से नृत्य का त्योहार है, और नृत्य का अर्थ है पैरों को हिलाना। रास नृत्य में प्रवेश करने से किसी के पैरों को अन्य चीजें करने से होने वाले कष्ट से मुक्ति मिलेगी।

जैसा कि श्री कपिलदेव अपनी माँ को बताते हैं:

सतां प्रसंगान्मम वीर्य-संविदो

भवन्ति हृत्-कर्ण-रसाशनाः कथाः

तज्-जोषणादाश्व अपवर्ग-वर्तमानि

श्रद्धा रतिर् भक्तिरनुक्रमीष्यति

"शुद्ध भक्तों के संग में, भगवान के व्यक्तित्व के बारे में चर्चा सुनने और दिल को बहुत प्रिय और संतुष्टिदायक होती है। प्रभु की गतिविधियों के ज्ञान का विकास करके, व्यक्ति ध क्रमशः मुक्ति के मार्ग पर उन्नत होता जाता है, और उसके बाद वह मुक्त हो जाता है, और उसका आकर्षण स्थिर हो जाता है। फिर वास्तविक भक्ति और भक्ति सेवा शुरू होती है।" (भागवत 3.25.25)

यहाँ भगवान कपिलदेव प्रेम के क्रमिक विकास के तीन लक्षणों का उल्लेख करते हैं: दृढ़ विश्वास (श्रद्धा), भगवान के लिए प्रेम (रति), और उनकी सेवा के प्रति अटूट समर्पण (भक्ति)। भक्ति प्रगति के दौरान, इनमें से प्रत्येक लक्षण स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है, बिना अलग प्रयास के। भगवान कपिलदेव का यह कहना नहीं है कि विकास का क्रम शाब्दिक रूप से श्रद्धा है, फिर रति और फिर भक्ति। बल्कि, हमें यह समझना चाहिए कि पहले एक नए भक्त को विश्वास (श्रद्धा) प्राप्त होता है, फिर सुनने, जप करने और सेवा करने की भक्ति प्रक्रिया को अपनाता है, और बाद में रति प्राप्त करता है। क्योंकि भक्ति का मतलब भक्ति सेवा का अभ्यास और सहज प्रेम की परिपक्व अवस्था दोनों है, इसलिए यह कहना ठीक है कि रति (प्रेम) भक्ति का फल है।

उसी भक्ति की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए, श्री ध्रुव भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हैं:

भक्तिं मुहुः प्रवाहतां त्वयि मे प्रसङ्गो

भूयादनन्ता महाताममलाशयानाम्

येनाञ्जसोल्वणम् उरु-व्यसनं भवाब्धिं

नेष्ये भवद्-गुण-कथामृतापानमत्तः

"हे असीम भगवान, कृपया मुझे आशीर्वाद दें कि मैं उन महान भक्तों के साथ जुड़ सकूँ जो आपकी पारलौकिक प्रेममयी सेवा में लगातार संलग्न रहते हैं, जैसे एक नदी की लहरें लगातार बहती हैं। ऐसे पारलौकिक भक्त पूरी तरह से जीवन की एक दूषित अवस्था में स्थित हैं। भक्ति सेवा की प्रक्रिया से, मैं निश्चित रूप से भौतिक अस्तित्व के अज्ञानी सागर को पार करने में सक्षम हो जाऊंगा, जो तेजस्वी, अग्नि जैसी खतरों की लहरों से भरा है। यह मेरे लिए बहुत आसान होगा, क्योंकि मैं आपके पारलौकिक गुणों और लीलाओं के बारे में सुनकर पागल हो रहा हूँ, जो सनातन हैं।" (भागवत 4.9.11)

चूँकि विष्णु के भक्त लगातार उनकी सेवा करते हैं (भक्तिम मुहुः प्रवहताम्), उनके हृदय पूरी तरह से शुद्ध होते हैं (अमलशयनम्), और इसी कारण से वे श्रेष्ठ आत्माएँ (महतम) हैं। ऐसे वैष्णवों की संगति अत्यंत वांछनीय है। जो व्यक्ति इसे प्राप्त कर लेता है, उसे जीवन के चौथे लक्ष्य, मुक्ति की आकांक्षा से परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मुक्ति शुद्ध भक्ति के उपोत्पाद के रूप में स्वतः ही मिल जाती है। ध्रुव को आशा है कि वैष्णवों की संगति में वह परम भगवान के बारे में विषयों का अमृत पीएगा, जो उसे मदहोश कर देगा और उसे संसार के खतरनाक सागर को सहजता से पार करने की शक्ति देगा। शराबी मुख्य रूप से अपनी शराब के स्वाद में रुचि रखते हैं; शराब के द्वितीयक प्रभावों में उनकी केवल सतही रुचि होती है, जैसे कि ठंड के मौसम की परेशानी को कम करने की इसकी क्षमता। इसी प्रकार, भगवद्-भक्ति के अमृत को पीने का स्वाद रखने वाले भक्त उस अमृत का सदैव आस्वादन करना ही अपना मुख्य लक्ष्य मानते हैं। वे मुक्ति और अन्य गौण लाभ तभी स्वीकार करते हैं जब ऐसे वरदान उस शाश्वत आनंद में बाधा नहीं डालते।

श्रीमद्भागवत (4.24.57-58) में भगवान शिव यह राय देते हैं:

क्षणार्धेनापि तुलये

न स्वर्गं नापुनर-भवम्

भगवत्-संगी-संगस्य

मार्त्यानाम् किम् उताशिषः

अथानाघाघ्रेस तव कीर्ति-तीर्थयोर

अंतर-बहिः-स्नान-विधुत-पापमानम्

भूतेष्व अनुक्रोश-सुसत्त्व-शीलिनाम्

स्यात् संगमोऽनुग्रह एषा नस तव

“यदि कोई संयोग से एक क्षण के लिए भी किसी भक्त के साथ जुड़ जाता है, तो वह कर्म या ज्ञान के परिणामों के आकर्षण के अधीन नहीं रहता है। फिर उसे देवताओं के आशीर्वाद में क्या रुचि हो सकती है, जो जन्म और मृत्यु के नियमों के अधीन हैं? मेरे प्रिय भगवान, आपके कमल चरण सभी शुभ चीजों के कारण हैं और पाप के सभी प्रदूषणों का नाश करने वाले हैं। इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मुझे अपने भक्तों की संगति से आशीर्वाद दें, जो आपके चरण कमलों की पूजा करके पूरी तरह से शुद्ध हो गए हैं और जो बद्ध आत्माओं पर बहुत दयालु हैं। मुझे लगता है कि आपका वास्तविक आशीर्वाद मुझे ऐसे भक्तों के साथ जुड़ने की अनुमति देना होगा।

मुक्ति के बजाय, शाही शक्ति और अन्य प्रकार की सफलताओं की तो बात ही क्या करें जिन्हें आम लोग महत्व देते हैं, भगवान शिव उन लोगों के साथ एक पल के लिए भी जुड़ाव पसंद करेंगे जो भगवान के व्यक्तित्व के साथ संगति रखते हैं। दूसरे शब्दों में, परम भगवान के भक्तों की संगति जीवन के अन्य सभी लक्ष्यों के सिर पर नाचती है। परम भगवान के चरण कमल, जिन्होंने अघ राक्षस का वध किया, सभी पापों को दूर कर देते हैं। भगवान की प्रसिद्धि सभी पवित्र तीर्थों का स्रोत है, जिसमें गंगा नदी और यमुना नदी भी शामिल हैं, जिनके स्नान घाट पर गोपियाँ पानी लाने के लिए जाती हैं। भगवान शिव दो शुद्धिकरण स्नान करते हैं - एक बाहरी रूप से गंगा में और दूसरा आंतरिक रूप से यमुना में। इसी प्रकार, परम भगवान की प्रसिद्धि में स्नान उनके भक्तों को दो तरह से शुद्ध करता है, बाहरी रूप से उन्हें नारकीय दंड से मुक्त करके और आंतरिक रूप से उनके दिलों को भौतिक आनंद की इच्छाओं से मुक्त करके। परम भगवान की प्रसिद्धि और उनके चरण कमलों के प्रति समर्पित व्यक्ति सभी प्राणियों के प्रति दयालु होते हैं। ऐसे भक्त सदैव वासना और हृदय के अन्य कल्मषों से रहित होकर पवित्रता से रहते हैं, और उनमें सादगी और अन्य सभी अनुकरणीय गुण होते हैं। भगवान शिव प्रार्थना करते हैं कि भगवान विष्णु की उन पर सबसे बड़ी कृपा बस उन्हें परम भगवान के भक्तों के संपर्क में आने देना होगी।

पांचवें सर्ग (5.12.12-13) में श्री जड भरत इसी प्रकार कहते हैं:

रहुगणाइतत् तपसा न याति

न सेजया निर्वाणाद गृहाद वा

न चन्दासा नैव जलाग्नि-सूर्यैर

विना महत्-पाद-रजो-अभिषेकम्

“मेरे प्रिय राजा रहूगण, जब तक किसी को महान भक्तों के चरण कमलों की धूल अपने पूरे शरीर पर लगाने का अवसर न मिले, वह परम सत्य का एहसास नहीं कर सकता। केवल ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य) का पालन करने से, गृहस्थ जीवन के नियमों और विनियमों का सख्ती से पालन करने से, वानप्रस्थ के रूप में घर छोड़ने से, संन्यास लेने से, या सर्दियों में खुद को पानी में डुबोकर गंभीर तपस्या करने से पूर्ण सत्य का एहसास नहीं हो सकता है। गर्मियों में अपने आप को आग और सूरज की चिलचिलाती गर्मी से घेरकर। परम सत्य को समझने की कई अन्य प्रक्रियाएँ हैं, लेकिन परम सत्य केवल उसी को पता चलता है जिसने किसी महान भक्त की दया प्राप्त की है।

यत्रोत्तमः-श्लोक-गुणानुवादः

प्रस्तुयते ग्राम्य-कथा-विघातः

निशेव्यमानो 'नु-दीनं मुमुक्षोर'

मतिम् सतीम् यच्चति वासुदेवे

“यहाँ वर्णित शुद्ध भक्त कौन हैं? शुद्ध भक्तों की सभा में राजनीति और समाजशास्त्र जैसे भौतिक विषयों पर चर्चा करने का प्रश्न ही नहीं उठता। शुद्ध भक्तों की सभा में, भगवान के गुणों, रूपों और लीलाओं की ही चर्चा होती है, जिनकी पूरे ध्यान से स्तुति और पूजा की जाती है। शुद्ध भक्तों की संगति में, ऐसे विषयों को लगातार आदरपूर्वक सुनने से, परम सत्य के अस्तित्व में विलीन होने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति भी इस विचार को त्याग देता है और धीरे-धीरे वासुदेव की सेवा में संलग्न हो जाता है।

यहां उद्धृत दो श्लोकों से ठीक पहले श्लोक में जड़ भरत ने परम सत्य की पहचान भगवान, पूर्ण व्यक्तित्व और वासुदेव, वासुदेव के प्रिय पुत्र वासुदेव के रूप में की। अब वह राजा रहूगण से कहते हैं कि आध्यात्मिक उन्नति के किसी भी सामान्य तरीके से इस सर्वोच्च व्यक्ति को प्राप्त करना असंभव है, जब तक कि उन तरीकों के साथ-साथ कोई शुद्ध वैष्णवों के पैरों की धूल से स्नान न करे। किसी के वर्ण और आश्रम के निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना, अपने मन को एकाग्र तप में केंद्रित करना, वैदिक यज्ञ करना, भोजन और अन्य दान वितरित करना, गृहस्थ के रूप में पवित्रता से काम करना, वेदों का अध्ययन करना, या जल, अग्नि की पूजा करना, पर्याप्त नहीं है। प्रकृति के अन्य तत्व, और उनके इष्टदेव-वरुण, अग्नि, इत्यादि। ये प्रयास किसी को भगवान वासुदेव की कृपा प्राप्त करने में तभी मदद कर सकते हैं जब साधक ने भगवान के भक्तों को भी प्रसन्न किया हो। और भक्तों को संतुष्ट करके कोई व्यक्ति सर्वोच्च भगवान की दया प्राप्त कर सकता है, भले ही उसने इनमें से कोई भी शुद्धिकरण कार्य न किया हो।

भगवान कृष्ण को उत्तम-श्लोक के रूप में जाना जाता है, जिनकी बेदाग प्रसिद्धि सभी अज्ञानता को दूर कर देती है। जब कोई उनके भक्तों के चरणों की धूल में स्नान कर लेता है, तो वह उन भक्तों की संगति में प्रवेश कर सकता है और उनसे कृष्ण के दिव्य गुणों के बारे में सुन सकता है, जिसकी शुरुआत उनके भक्तों के प्रति उनकी निरंतर दयालुता से होती है। प्रतिदिन इस शुद्ध कृष्ण-कथा का श्रवण एक भौतिकवादी को मुक्ति के आकांक्षी के स्तर तक उठा देता है, और ऐसे आकांक्षी को कृष्ण की भक्ति सेवा में सच्ची रुचि के स्तर तक उठा देता है।

उसी कथन में, राहुगण जड़ भरत को उत्तर देते हैं:

अहो नृ-जन्मखिला-जन्म-शोभनम्

किम जन्माभिस टीवी अपरैर अपी अमुस्मिन

न यद् ऋषिकेश-यशः-कृतात्मनम्

महात्मनम् वैः प्राचुरः समागमः

“पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में यह जन्म सभी जन्मों में सर्वोत्तम है। यहाँ तक कि स्वर्ग में देवताओं के बीच जन्म भी उतना गौरवशाली नहीं है। किसी देवता की सर्वोच्च स्थिति का क्या उपयोग है? स्वर्ग में प्रचुर भौतिक सुख-सुविधाओं के कारण भक्तों के साथ जुड़ने की कोई संभावना नहीं है।'' (भागवत 5.13.21)

भगवद्-भक्ति की ओर आकर्षित होने के लिए मानव जीवन सबसे अनुकूल स्थिति है। मूर्ख लोगों के लिए देवता का जीवन वांछनीय हो सकता है, लेकिन जड़ भरत जैसे महान संत शायद ही कभी स्वर्गीय ग्रहों पर जाते हैं। देवता, इंद्रियतृप्ति में अत्यधिक लीन होने के कारण, आम तौर पर ऐसे शुद्ध वैष्णवों की संगति के लायक नहीं होते हैं। स्वर्ग की यात्रा करने के बजाय, संत वैष्णव, जो भगवान हृषिकेश की महिमा का चिंतन करके अपने हृदय को शुद्ध रखते हैं, आमतौर पर पृथ्वी पर पवित्र स्थानों में घूमना पसंद करते हैं।

श्री प्रहलाद महाराज की राय में:

नैशां मतिस् तवद उरुक्रमंघृम्

स्पृशति अनर्थपगमो यद-अर्थः

महीयसाम् पाद-रजो-अभिषेकम्

निश्किंचानां न वृणित यावत्

“जब तक भौतिकवादी जीवन के प्रति अत्यधिक इच्छुक व्यक्ति अपने शरीर पर भौतिक प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त किसी वैष्णव के चरण कमलों की धूल नहीं लगाते, ऐसे व्यक्ति भगवान के चरण कमलों से नहीं जुड़ सकते, जो अपनी असामान्य गतिविधियों के लिए महिमामंडित हैं। केवल कृष्णभावनाभावित बनकर और इस प्रकार भगवान के चरणकमलों की शरण लेकर ही व्यक्ति भौतिक संदूषण से मुक्त हो सकता है।" (भागवत 7.5.32)

प्रह्लाद ने यह बयान देने से ठीक पहले, इस दुनिया के अज्ञानी भौतिकवादियों के लिए चिंता व्यक्त की, जो यह पहचानने में असमर्थ हैं कि उनके स्वयं के हित के लिए सबसे अच्छा लक्ष्य भगवान विष्णु हैं। जब तक वे शुद्ध वैष्णवों की चरण-धूल में स्नान नहीं करते, जो सभी प्रकार के स्वार्थी भोगों को अस्वीकार करते हैं और भगवद-भक्ति के अलावा किसी और चीज की परवाह नहीं करते हैं, ऐसे सकल भौतिकवादियों का मन कभी भी भगवान की भक्ति की ओर नहीं जा सकता है। महान भक्तों की दया के बिना, मूर्ख भौतिकवादी सैद्धांतिक रूप से भी आध्यात्मिक सत्य का पता नहीं लगा सकते हैं, इसके मूर्त फल प्राप्त करने की तो बात ही क्या है।

राजा मुकुकुंद के शब्दों में:

भावापवर्गो भ्रमतो यदा भवेज

जनस्य प्रकार्य अच्युत सत्-समागमः

सत्-संगमो यार्हि तदैव सद-गतौ

परवरेष त्वयि जयते रतिः

“जब एक भटकती आत्मा का भौतिक जीवन समाप्त हो जाता है, हे अच्युता, वह आपके भक्तों की संगति प्राप्त कर सकता है। और जब वह उनके साथ जुड़ता है, तो उसके भीतर आपके प्रति भक्ति जागृत हो जाती है, जो भक्तों का लक्ष्य और सभी कारणों और प्रभावों के भगवान हैं। (भागवत 10.51.53)

बद्ध आत्माएं जन्म और मृत्यु के चक्र में लक्ष्यहीन रूप से भटकती हैं, और इस भटकन से तंग आने के बाद ही उन्हें शुद्ध वैष्णवों के संपर्क में आने की अनुमति दी जाती है। फिर, संत वैष्णवों की संगति से, उन भाग्यशाली आत्माओं में से कुछ को न केवल जन्म और मृत्यु (संसार) के चक्र से मुक्ति मिलती है, बल्कि उन्हें इससे भी अधिक मूल्यवान कुछ मिलता है - सभी कारणों और प्रभावों के सर्वोच्च नियंत्रक के लिए शुद्ध प्रेम। और यदि वे परम भगवान के प्रति घनिष्ठ प्रेम प्राप्त करने के लिए पर्याप्त भाग्यशाली नहीं हैं, तो कम से कम वे सीखते हैं कि सभी महान देवताओं और सामान्य प्राणियों के शासक, उनकी श्रद्धापूर्वक सेवा कैसे करें।

इन मतों की पुष्टि स्वयं भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध (11.26.31-34) में की है:

यथोपाश्रयमानस्य

भगवन्तं विभावसुम

शीतं भयं तमो पयेति

साधुं संसेवत्स तथा

“जिस प्रकार यज्ञ अग्नि के पास जाने वाले के लिए ठंड, भय और अंधकार नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार भगवान के भक्तों की सेवा में लगे व्यक्ति के लिए नीरसता, भय और अज्ञान नष्ट हो जाते हैं।

निमज्ज्योनमज्जतम् घोरे

भावाब्धौ परमायणम्

संतो ब्रह्म-विद: शांता

नौर दृढेवाप्सु मज्जातम

“शांतिपूर्वक पूर्ण ज्ञान में स्थिर भगवान के भक्त, उन लोगों के लिए अंतिम आश्रय हैं जो भौतिक जीवन के भयानक सागर में बार-बार चढ़ते और गिरते हैं। भक्त एक मजबूत नाव की तरह हैं जो डूबने के समय लोगों को बचाने के लिए आते हैं।

अन्नं हि प्राणिनां प्राण

अर्तानाम् शरणम् टीवी अहम्

धर्मो वित्तं नृणां प्रेतय

सन्तोऽर्वाग् बिभ्यतोऽरणम्

"जिस प्रकार भोजन सभी प्राणियों का जीवन है, जिस प्रकार मैं संकटग्रस्त लोगों के लिए अंतिम आश्रय हूं, और जिस प्रकार धर्म उन लोगों का धन है जो इस दुनिया से मर रहे हैं, मेरे भक्त ही गिरने से डरे हुए लोगों के लिए एकमात्र आश्रय हैं" जीवन की दयनीय स्थिति में।

सन्तो दिशान्ति चक्षुणसि

बहिर अर्कः समुत्थितः

देवता बांधवः संतः

संता आत्महं एव च

“मेरे भक्त दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं, जबकि सूर्य केवल बाहरी दृष्टि की अनुमति देता है, और वह भी तब जब वह आकाश में उगता है। मेरे भक्त ही वास्तविक पूजनीय देवता और वास्तविक परिवार हैं; वे स्वयं ही हैं, और अंततः वे मुझसे भिन्न नहीं हैं।"

जिस प्रकार अग्नि के पास जाने से अंधकार और सांपों तथा जंगली जानवरों के भय से मुक्ति मिल सकती है, उसी प्रकार शुद्ध वैष्णवों के पास जाकर व्यक्ति भौतिकवादी जीवन के अंधकार से, भविष्य में क्या होगा के भय से और आनंदमय सेवा के विस्मृति से मुक्त हो सकता है भगवान के लिए, एक विस्मृति जो सभी भौतिक अज्ञानता और भय का मूल है।

उपसर्ग उप- श्लोक की शुरुआत में यथोपश्रयमानस्य (अर्थात्, यथा उप-श्रयमानस्य) दूर से आने के विचार को इंगित करता है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई व्यक्ति अलगाव में भी वैष्णवों की सेवा करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। संत वैष्णव जो व्रज-धाम में प्रकट होने वाले परम सत्य को समझते हैं, वे उच्च और निम्न जन्म के चक्र में फंसे व्यक्तियों का उद्धार कर सकते हैं। वैष्णव ऐसा अमूल्य उपहार देने के योग्य हैं क्योंकि उन्हें कृष्ण की भक्ति सेवा की महिमा का एहसास हुआ है, जो वैदिक शिक्षाओं का गोपनीय सार है। ऐसे भक्त, जो मुक्त होने की संभावना से भी शांत और अविचलित होते हैं, भाग्यशाली आत्माओं को विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करते हैं - पूर्ण सत्य की अवैयक्तिक और व्यक्तिगत विशेषताओं की प्राप्ति और भगवद-भक्ति के कई अलग-अलग तरीकों की समझ। इसके विपरीत, बाहरी सूर्य प्रकाश देता है, लेकिन केवल सीमित तरीके से।

वैष्णवों की सभी महिमाओं को गिनने का प्रयास करने के बजाय - एक असंभव कार्य - हमें यह जानना चाहिए कि एक अकेला संत भक्त सभी देवताओं के बराबर है। शुद्ध भक्त ही हमारे सच्चे मित्र और हमारे प्रिय प्राण, हमारे जीवन का स्रोत हैं। वास्तव में, कृष्ण की राय में वैष्णव स्वयं से भिन्न नहीं हैं।

इससे पहले श्रीमद-भागवतम (11.11.49) में कृष्ण ने उद्धव से कहा, "अब मैं तुम्हें विशेष रूप से गोपनीय बात बताऊंगा क्योंकि तुम मेरे सेवक, शुभचिंतक और साथी हो।" तब कृष्ण ने कहा:

न रोधयति माम् योगो

न सांख्यं धर्म एव च

न स्वाध्याय तपस त्यागो

नेस्ता-पूर्णम् न दक्षिणा

व्रतानि यज्ञश् चंदांसि

तीर्थानि नियम यमः

यथावरुन्धे सत्-संगः

सर्व-संगपहो हि माम

"मेरे प्रिय उद्धव, मेरे शुद्ध भक्तों की संगति से कोई भी व्यक्ति भौतिक इन्द्रियतृप्ति की सभी वस्तुओं के प्रति अपनी आसक्ति को नष्ट कर सकता है। ऐसी पवित्र संगति मुझे किसी के नियंत्रण में लाती है। कोई व्यक्ति अष्टांग-योग प्रणाली का अभ्यास कर सकता है, भौतिक प्रकृति के तत्वों के दार्शनिक विश्लेषण में संलग्न हो सकता है, अहिंसा और धर्मपरायणता के अन्य सामान्य सिद्धांतों का अभ्यास कर सकता है, या वेदों का जाप कर सकता है। कोई व्यक्ति तपस्या कर सकता है, संन्यास ले सकता है, यज्ञ कर सकता है, कुआँ खोद सकता है, पेड़ लगा सकता है और अन्य लोक-कल्याणकारी गतिविधियाँ कर सकता है। कोई दान दे सकता है, गंभीर व्रत कर सकता है, देवताओं की पूजा कर सकता है, गोपनीय मंत्रों का जाप कर सकता है, पवित्र स्थानों की यात्रा कर सकता है, या बड़े और छोटे अनुशासनात्मक आदेश स्वीकार कर सकता है। परन्तु ऐसे कार्य करके भी कोई मुझे अपने वश में नहीं कर सकता।” (भागवतम् 11.12.1-2)

पतंजलि ऋषि की अष्टांग-योग पद्धति के पहले और दूसरे चरण बारह नियम ("छोटे नियम") और बारह यम ("प्रमुख नियम") हैं। श्री कृष्ण ने उद्धव के लिए इन्हें सूचीबद्ध किया है:

अहिंसा सत्यम अस्तेयम

असंगों ह्रीर असंचयः

आस्तिक्यं ब्रह्मचर्यं च

मौनं स्थिर्यं क्षमाभयम्

शौकं जपस तपो होमः

श्रद्धातिथ्यं मद-अर्चनम्

तीर्थानां परार्थेहा

तुष्टिर आचार्य-सेवनम्

एते यमः स-नियम

उभयोर द्वादश स्मृतः

पुंसाम उपासितस तत

यथा-कामं दुहन्ति हि

“अहिंसा; सत्यता; दूसरों की संपत्ति का लालच करने या चोरी करने की अनिच्छा; वैराग्य; विनम्रता; स्वामित्व से मुक्ति; धर्म के सिद्धांतों में विश्वास; ब्रह्मचर्य; मौन; स्थिरता; माफी; और निर्भयता बारह प्राथमिक अनुशासनात्मक सिद्धांत हैं। आंतरिक सफ़ाई; बाहरी सफ़ाई; भगवान के पवित्र नामों का जप करना; तपस्या; त्याग करना; आस्था; मेहमाननवाज़ी; मेरी पूजा करो; पवित्र स्थानों का दौरा करना; केवल सर्वोच्च हित के लिए कार्य करना और उसकी इच्छा करना; संतुष्टि; और आध्यात्मिक गुरु की सेवा नियमित निर्धारित कर्तव्यों के बारह तत्व हैं। ये चौबीस तत्व उन व्यक्तियों को सभी वांछित आशीर्वाद प्रदान करते हैं जो भक्तिपूर्वक इनका पालन करते हैं। (भागवतम् 11.19.33-35)

श्रेष्ठ वैष्णवों की संगति न केवल भौतिक आसक्ति का प्रतिकार करती है, बल्कि वैकुंठ और गोलोक के अलावा अन्य स्थानों में परम भगवान की लीलाओं के प्रति आसक्ति का भी प्रतिकार करती है। वैष्णवों के साथ सीधे संपर्क की शक्ति के बारे में क्या कहा जाए, यहां तक ​​कि उनकी महानता का वर्णन सुनने से भी सर्वोच्च सफलता मिलती है, जैसा कि श्री विदुर ने श्रीमद-भागवतम (3.13.4) के तीसरे स्कंध में कहा है:

श्रुतस्य पुंसाम सुचिर-श्रमस्य

नन्व अंजसा सुरिभिर इदितोऽरथः

तत्-तद्-गुणानुश्रवणं मुकुंद-

पदरविंदं हृदयेषु येषाम्

“जो लोग बड़े परिश्रम से और लंबे समय तक आध्यात्मिक गुरु से सुनते हैं, उन्हें उनके मुंह से शुद्ध भक्तों के चरित्र और गतिविधियों के बारे में सुनना चाहिए, जो हमेशा भगवान मुकुंद के चरण कमलों के बारे में अपने दिल में सोचते हैं, वह जो हैं उन्हें मुक्ति प्रदान करता है।

चौथे सर्ग (4.9.10) में ध्रुव महाराज एक समान बयान देते हैं:

या निवृत्ति तनु-भृतं तव पद-पद्म-

ध्यानाद भावज-जन-कथा-श्रवणेन वा स्यात्

स ब्राह्मणी स्व-महिमनी अपि नाथ मा भूत

किं व अंतकासि-लुलितात् पतनम् विमानत

“हे भगवान, आपके चरण कमलों का ध्यान करने या आपके शुद्ध भक्तों की महिमा सुनने से प्राप्त होने वाला दिव्य आनंद इतना असीमित है कि यह ब्रह्मानंद के चरण से बहुत परे है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को निर्विशेष ब्रह्म में विलीन होकर सर्वोच्च के साथ एक मानता है। . चूंकि ब्रह्मानंद भी भक्ति सेवा से प्राप्त पारलौकिक आनंद से पराजित हो गया है, तो स्वयं को स्वर्गीय ग्रहों तक ऊपर उठाने के अस्थायी आनंद के बारे में क्या कहा जाए, जो समय की अलग तलवार से समाप्त हो जाता है? यद्यपि कोई व्यक्ति स्वर्गीय ग्रहों तक पहुंच सकता है, लेकिन समय के साथ उसका पतन हो जाता है।''

और न केवल परम भगवान के भक्तों के साथ किसी भी संपर्क से जीवन में पूर्ण सफलता की गारंटी होती है, बल्कि उनके भक्तों की संगति भी पूर्णता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है। इस प्रकार ध्रुव महाराज कहते हैं:

ते न स्मरंति अतितरं प्रियं ईशा मर्त्यं

ये कैनव अदा: सुत-सुहृद-गृह-वित्त-दार:

ये टीवी अबजा-नाभ भवदिया-पदारविंदा-

सौगन्ध्य-लुब्धा-हृदयेषु कृत-प्रसंगः

“हे भगवान जिनकी नाभि कमल है, यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के साथ जुड़ता है जिसका हृदय आपके भक्तों के चरण कमलों के लिए लालायित रहता है - जिसका हृदय हमेशा उन कमल चरणों की सुगंध चाहता है - तो वह कभी भी भौतिक शरीर से जुड़ा नहीं होता है या, एक शारीरिक संबंध, संतान, मित्र, घर, धन और पत्नी से, जो भौतिकवादी व्यक्तियों को बहुत, बहुत प्रिय हैं। सचमुच, उसे उनकी कोई परवाह नहीं है।” (भागवत 4.9.12)

निर्विशेषवादी योगी समेत किसी भी अन्य के विपरीत, जिन उन्नत भक्तों में भगवान के चरणकमलों के प्रति शुद्ध प्रेम होता है, वे शरीर के साथ अपनी पहचान के मिथ्यात्व से पूरी तरह मुक्त होते हैं। भगवान विष्णु के हंस अवतार (भागवत 11.13.36) के शब्दों में:

देहं च नश्वरं अवस्थितं उत्थितं वा

सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत स्वरूपम्

दैवद अपेतम् अथ दैव-वषाद् उपेतम्

वसो यथा परिहितं मदिरा-मदन्धः

“जिस प्रकार एक शराबी व्यक्ति को यह ध्यान नहीं रहता कि उसने अपना कोट या शर्ट पहना है या नहीं, उसी प्रकार जो व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार में परिपूर्ण है और इस प्रकार उसने अपनी शाश्वत पहचान प्राप्त कर ली है, उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि उसका अस्थायी शरीर बैठा है या खड़ा है। वास्तव में, यदि भगवान की इच्छा से शरीर समाप्त हो जाता है या भगवान की इच्छा से उसे एक नया शरीर मिलता है, तो एक आत्म-साक्षात्कारी आत्मा को ध्यान नहीं आता है, जैसे एक शराबी व्यक्ति को अपनी बाहरी पोशाक की स्थिति पर ध्यान नहीं जाता है।

भगवान ऋषभदेव महान भक्तों के लक्षणों का वर्णन करते हैं:

महन्तस ते सम-चित्तः प्रशांता

विमान्यवः सुहृदः साधवो ये

“महात्मा समदर्शी होते हैं । वे एक जीव और दूसरे जीव में कोई अंतर नहीं देखते। वे बहुत शांतिपूर्ण हैं, पूरी तरह से भक्ति में लगे हुए हैं, और क्रोध से रहित हैं, और वे सभी के लाभ के लिए काम करते हैं। वे किसी भी तरह का घृणित व्यवहार नहीं करते.

ये वा मयेष कृत-सौहृदार्थ

जनेषु देहं-भार-वर्तिकेषु

गृहेषु जयात्मज-रतिमत्सु

न प्रीति-युक्त यावद-अर्थश च लोके

“जो लोग कृष्ण चेतना को पुनर्जीवित करने और भगवान के प्रति अपने प्रेम को बढ़ाने में रुचि रखते हैं, वे ऐसा कुछ भी करना पसंद नहीं करते हैं जो कृष्ण से संबंधित नहीं है। उन्हें ऐसे लोगों के साथ घुलने-मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं है जो अपने शरीर को बनाए रखने में व्यस्त हैं - खाना, सोना, संभोग करना और बचाव करना। वे अपने घरों से बंधे नहीं हैं, भले ही वे गृहस्थ हों। न ही वे पत्नियों, बच्चों, दोस्तों या धन से जुड़े हुए हैं। साथ ही, वे अपने कर्तव्यों के पालन के प्रति उदासीन नहीं हैं। ऐसे लोग केवल शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए पर्याप्त धन इकट्ठा करने में रुचि रखते हैं। (भागवत 5.5.2-3)

क्योंकि महात्मा प्रेम और घृणा की भौतिक उत्तेजनाओं से मुक्त होते हैं, वे मित्रों, शत्रुओं और तटस्थ पक्षों के प्रति समान स्वभाव रखते हैं। दूसरे शब्दों में, महान आत्माएँ शांतिपूर्ण होती हैं। यह शांति उनके क्रोध से मुक्त होने के कारण है, यह स्वतंत्रता उनके अहैतुकी परोपकारी होने के कारण है, और यह उपकार उनके संत आचरण के प्रति दृढ़ता से प्रतिबद्ध होने के कारण है। जीवन में उनका उद्देश्य भगवान के भरोसेमंद मित्र बनना है। केवल उस लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए, उन्हें ऐसे लोगों के साथ रहने में कोई आनंद नहीं आता है, जो आध्यात्मिक जीवन के उच्च हितों को आगे बढ़ाने के बजाय, केवल अपने शरीर को बनाए रखने में रुचि रखते हैं। बल्कि, महात्मा अपने भौतिक शरीर को बनाए रखने के लिए यथासंभव कम ऊर्जा खर्च करते हैं।

भगवान कृष्ण श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध (11.14.17) में उद्धव को महात्मा वैष्णवों का अपना मूल्यांकन देते हैं:

निष्किंचन मय्य अनुरक्त-चेतसः

शांता महंतो 'खिल-जीव-वत्सलाः'

कामैर अनलब्धा-धियो जुशन्ति ते

यं नैरापेक्ष्यं न विदुः सुखं मम

“जो लोग व्यक्तिगत संतुष्टि की इच्छा से रहित हैं, जिनका मन हमेशा मुझसे जुड़ा रहता है, जो शांतिपूर्ण हैं, झूठे अहंकार से मुक्त हैं, और सभी जीवों के प्रति दयालु हैं, और जिनकी चेतना इंद्रिय संतुष्टि के अवसरों से कभी प्रभावित नहीं होती है - ऐसे व्यक्ति आनंद लेते हैं मुझमें एक ऐसी खुशी है जिसे भौतिक संसार से ऐसी वैराग्य की कमी वाले लोग न तो जान सकते हैं और न ही प्राप्त कर सकते हैं।

जिन भक्तों का हृदय पूरी तरह से परमपुरुष के प्रति समर्पित है, वे ही सच्चे महात्मा हैं। कुछ बाहरी लक्षण हैं जिनके द्वारा ऐसी महान आत्माओं को जाना जा सकता है: वे अधिग्रहण से बचते हैं, वे आकर्षण और विकर्षण से परे हैं, वे सभी जीवित प्राणियों के लिए स्नेहपूर्वक चिंतित हैं, और वे दिल से शुद्ध हैं, स्वार्थी आनंद की भावना से अछूते हैं। उनकी आंतरिक विशेषता भगवान के व्यक्तित्व के साथ संबंध से मिलने वाली खुशी है, जिसे शुद्ध वैष्णवों के अलावा कोई नहीं जान सकता है।

भगवान का अपना सुख भी आत्म-संतुष्ट निर्विशेषवादियों के ब्रह्मानंद के समान कुछ भी नहीं है। क्योंकि कृष्ण अपने सेवकों के सेवक हैं, वे हमेशा अपने भक्तों के साथ भक्ति-रस का आनंदमय स्वाद साझा करने के लिए उत्सुक रहते हैं:

अहं भक्त-पराधीनो

ह्य अश्वतन्त्र इव द्विज

साधुभिर ग्रस्ता-ह्रदयो

भक्तैर भक्त-जन-प्रियः

“मैं पूरी तरह से अपने भक्तों के नियंत्रण में हूं। दरअसल, मैं बिल्कुल भी स्वतंत्र नहीं हूं। चूँकि मेरे भक्त पूरी तरह से भौतिक इच्छाओं से रहित हैं, मैं केवल उनके हृदय के भीतर ही विराजमान हूँ। मेरे भक्तों की तो बात ही क्या, मेरे भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय हैं।” (भागवत 9.4.63)

दृढ़ विश्वास वाला भक्त ईमानदारी से भगवान की पूजा में लगा रहता है। और जब, उस पूजा के द्वारा, उसमें दिव्य आकर्षण विकसित हो जाता है, तो वह सच्चा महात्मा बन जाता है। इस प्रकार आस्था जो आसक्ति की ओर ले जाती है, एक उन्नत वैष्णव का प्रमुख आंतरिक लक्षण है। नौ योगेन्द्रों में से एक, श्री हविस ने शुद्ध भक्तों की इस सबसे आवश्यक विशेषता का वर्णन किया है:

विसृजति हृदयं न यस्य साक्षाद्

धारिर अवशाभिहितो 'प्य अघोघा-नाशाः'

प्रणय-रशनाय धृतंघृ-पद्मः

स भवति भागवत-प्रधान उक्त:

“भगवान का परम व्यक्तित्व बद्ध आत्माओं के प्रति इतना दयालु है कि यदि वे अनजाने में या अनिच्छा से भी, उनके पवित्र नाम का उच्चारण करके उन्हें पुकारते हैं, तो भगवान उनके हृदय में असंख्य पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं को नष्ट करने के लिए इच्छुक होते हैं। इसलिए, जब कोई भक्त जिसने भगवान के चरण कमलों का आश्रय ले लिया है, सच्चे प्रेम से कृष्ण के पवित्र नाम का जाप करता है, तो भगवान ऐसे भक्त का हृदय कभी नहीं त्याग सकते। जिसने इस प्रकार परम भगवान को अपने हृदय में प्रेम की रस्सियों से बांध लिया है, उसे भागवत-प्रधान, भगवान का सबसे श्रेष्ठ भक्त कहा जाना चाहिए। (भागवतम् 11.2.55)

सबसे श्रेष्ठ वैष्णव भगवान हरि की पूजा उनके मूल कृष्ण रूप में करते हैं, कृष्णस तु भगवान स्वयं। (भागवत 1.3.28) कृष्ण के पवित्र नाम, उनसे अभिन्न होने के बावजूद (साक्षाद् धारी:), इतने शक्तिशाली हैं कि अनजाने में भी उच्चारण किए जाने पर वे पापों के ढेर को नष्ट कर देते हैं। कृष्ण, अपनी अकल्पनीय अद्भुत वृन्दावन लीलाओं में, अघासुर जैसे कई राक्षसों को मारकर और उन्हें मुक्ति प्रदान करके उनके खतरे को कम करते हैं। वृन्दावन में, कृष्ण के प्रेमी भक्तों ने उन्हें अपने हृदय में बाँध लिया है ताकि वे कभी बच न सकें। उपरोक्त कथन में भागवत-प्रधानः शब्द का उपयोग करके इन सबसे अंतरंग भक्तों का वर्णन किया गया है, जो व्याकरणिक रूप से एकवचन शब्द है, क्योंकि वे संख्या में अपेक्षाकृत कम हैं।

एवं सल-लक्षणा लोके

दुर्लभ मानवः कलौ

ना ही सिंह-समुहा वै

दृश्यन्ते यत्र कुत्रचित्

“कलियुग में ऐसे संत गुणों वाले मनुष्य इस संसार में बहुत कम पाए जाते हैं। निश्चित रूप से हम कभी भी एक ही स्थान पर कई शेरों को एक साथ नहीं देख पाते हैं।” या जैसा कि देवी पृथ्वी श्री हरि-भक्ति-शुद्धोदय (13.2) में कहती हैं, सु-दुर्लभ भागवत हि लोके: "शुद्ध भक्त इस दुनिया में बहुत दुर्लभ हैं।" और महाराज निमि के शब्दों में:

दुर्लभो मानुषो देहो

देहिनाम कृष्ण-भंगुर:

तत्रापि दुर्लभं मन्ये

वैकुंठ-प्रिय-दर्शनम्

"बद्ध आत्माओं के लिए, मानव शरीर प्राप्त करना सबसे कठिन है, और इसे किसी भी क्षण खोया जा सकता है। लेकिन मुझे लगता है कि जिन लोगों ने मानव जीवन प्राप्त कर लिया है, वे भी शायद ही कभी शुद्ध भक्तों की संगति प्राप्त कर पाते हैं, जो वैकुंठ के भगवान के प्रिय हैं। (भागवतम् 11.2.29)

शुद्ध वैष्णव भौतिक जगत में बहुत कम पाए जाते हैं क्योंकि श्री कृष्ण के प्रति भक्ति केवल उसी व्यक्ति में उत्पन्न होती है जो सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो चुका है और जिसने सभी पवित्र कर्तव्यों का उचित रूप से पालन किया है।

येषां टीवी अंत-गतं पापं

जनानां पुण्य-कर्मणाम्

ते द्वन्द्व-मोह-निर्मुक्ता

भजन्ते माम् दृढ़-व्रतः

"जिन व्यक्तियों ने पिछले जन्मों और इस जीवन में पवित्रतापूर्वक कार्य किया है और जिनके पाप कर्म पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं, वे भ्रम के द्वंद्व से मुक्त हो जाते हैं, और वे दृढ़ संकल्प के साथ मेरी सेवा में संलग्न हो जाते हैं।" (भगवद गीता 7.28)

दान-व्रत-तपो-होम-

जप-स्वाध्याय-संयममैः

श्रेयोभिर विविधैश कैन्यैः

कृष्णे भक्तिर हि साध्यते

"भगवान कृष्ण की भक्ति प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को दान करना चाहिए, कठोर व्रतों का पालन करना चाहिए, तपस्या और अग्नि यज्ञ करना चाहिए, जप करना चाहिए, वैदिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए, नियामक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए और कई अन्य शुभ प्रथाओं का पालन करना चाहिए।" (भागवत 10.47.24)

जन्मान्तर-सहस्रेषु

तपो-ज्ञान-समाधिभिः

नाराणं कृष्ण-पापानं

कृष्ण भक्तिः प्रजायते

"हजारों जन्मों तक तपस्या, ज्ञान और ध्यान समाधि की खेती करने से जिन मनुष्यों के पाप पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं, वे कृष्ण के प्रति भक्ति विकसित कर सकते हैं।" (योग-वशिष्ठ-रामायण)

इन कथनों से हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि जिस व्यक्ति में परमेश्वर के प्रति भक्ति नहीं है वह पापी होगा। न ही निर्विशेष मुक्ति के साधकों द्वारा प्राप्त ज्ञान को भक्ति कहा जा सकता है, क्योंकि योग-वशिष्ठ जैसे ग्रंथ भी, जो अवैयक्तिकता से रंगे हुए हैं, संकेत करते हैं कि तप, ज्ञान और समाधि भगवद-भक्ति के अंत के साधन हैं। जैसा कि श्रील श्रीधर स्वामी भगवद गीता पर अपनी टिप्पणी के अंत में लिखते हैं, ज्ञानस्य भक्ति-अवन्तर-व्यापरत्वम् एव: "ज्ञान एक गौण गतिविधि है, जो भक्ति के अधीन है।" और स्वयं भगवद गीता (10.10, 18.54-55) में कृष्ण स्पष्ट रूप से ज्ञान (बुद्धि-योग) का वर्णन करते हैं, जो कि अंतिम लक्ष्य, उनके प्रति शुद्ध भक्ति को प्राप्त करने का एक साधन है:

तेषां सतत-युक्तानां

भजताम् प्रीति-पूर्वकम्

ददामि बुद्धि-योगं तम्

येन माम् उपयन्ति ते

"जो लोग प्रेम से मेरी सेवा में निरंतर समर्पित रहते हैं, मैं उन्हें वह समझ देता हूं जिसके द्वारा वे मेरे पास आ सकते हैं।"

ब्रह्म-भूत: प्रसन्नात्मा

न शोचति न कांक्षति

समः सर्वेषु भूतेषु

मद्-भक्तिं लभते परम

“जो व्यक्ति दिव्य रूप से स्थित है, उसे तुरंत परम ब्रह्म का एहसास हो जाता है और वह पूरी तरह से आनंदित हो जाता है। वह कभी शोक नहीं करता या कुछ पाने की इच्छा नहीं रखता। वह प्रत्येक जीव के प्रति समान भाव रखता है। उस अवस्था में उसे मेरी शुद्ध भक्ति प्राप्त होती है।

भक्त्या माम अभिजानाति

यवन् यश चस्मि तत्वतः

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा

विशते तद-अनंतरम्

“कोई मुझे उस रूप में समझ सकता है जैसा मैं हूं, भगवान के रूप में, केवल भक्तिमय सेवा द्वारा। और जब कोई ऐसी भक्ति से मेरे प्रति पूर्ण चेतना में होता है, तो वह भगवान के राज्य में प्रवेश कर सकता है।

इस प्रकार कृष्ण हमेशा ज्ञान और भक्ति के बीच अंतर करते हैं, और उनके वफादार भक्त भी ऐसा ही करते हैं। निस्संदेह, इसका मतलब यह है कि पूर्ण के अवैयक्तिक उपासक सर्वोच्च व्यक्ति के भक्तों के समान आध्यात्मिक रूप से उन्नत नहीं हैं। श्रीमद-भागवतम के चौथे स्कंध (4.22.39) में सनत-कुमार महाराज पृथु से कहते हैं:

यत्-पाद-पंकज-पलाश-विलास-भक्त्या

कर्मशयाम् ग्रथितम् उद्ग्रथयन्ति सन्तः

तद्वं न रिक्ता-मतायो यतयोऽपि रुद्ध-

स्रोतोगण तम ​​अरणां भज वासुदेवम्

“जो भक्त हमेशा भगवान के चरण कमलों की सेवा में लगे रहते हैं, वे सकाम गतिविधियों की कठिन इच्छाओं पर बहुत आसानी से काबू पा सकते हैं। क्योंकि यह बहुत कठिन है, अभक्त-ज्ञानी और योगी-इंद्रिय संतुष्टि की लहरों को रोकने की कोशिश करते हुए भी ऐसा नहीं कर सकते। इसलिए आपको वासुदेव के पुत्र कृष्ण की भक्ति सेवा में संलग्न होने की सलाह दी जाती है।

सर्वोच्च भगवान अपनी ऊर्जाओं को जिन असीमित तरीकों से नियोजित करते हैं वे सभी उनके विलास ("खेल के लिए विस्तार") हैं। लेकिन शुद्ध वैष्णव विशेष रूप से श्री वृन्दावन और उनके अन्य आध्यात्मिक निवासों में उनके विलास के बारे में सुनकर और जप करके उनकी सेवा करने के लिए आकर्षित होते हैं। इस प्रकार भगवान कपिलदेव ने अपनी मां को कई प्रकार के प्रगतिशील अनुशासन के बारे में विस्तार से निर्देश देने के बाद, उन्हें सलाह दी कि, सभी साधनाओं में, वैकुंठ के भगवान की लीलाओं का पाठ सबसे महत्वपूर्ण है।

भक्ति सेवा स्वयं भी विलास है, जो शुद्ध आनंद की अभिव्यक्ति है। परम भगवान के महा-प्रसाद के सम्मान के भक्ति-विलास में भाग लेकर और उनकी प्रसन्नता के लिए नृत्य, गायन और अन्य सेवाएँ करके, संत भक्त अपने हृदय के भीतर भौतिक बंधन की गांठें - झूठे अहंकार से पैदा हुई भौतिकवादी प्रवृत्तियाँ - खोल देते हैं। निर्विशेषवादी संन्यासी इंद्रियों को वश में कर सकते हैं, लेकिन वे अपने हृदय को बांधने वाली कर्म की गांठों को खोलने में असमर्थ हैं। या भले ही वे उन गांठों को खोलना शुरू करने में सक्षम हों, फिर भी वे उन्हें पूरी तरह से खोल नहीं सकते हैं। इंद्रियों के आवेगों की तुलना गंगा जैसी शक्तिशाली नदी की धारा से की जाती है, जिसे कभी रोका नहीं जा सकता; शुद्ध भक्ति सेवा में सर्वोच्च भगवान की आंतरिक ऊर्जा की विशेष सुरक्षा के बिना, कोई भी संवेदी उत्तेजना के निरंतर प्रवाह को नहीं रोक सकता है। इसलिए, अभक्त संन्यासी अपने ऊंचे पद से गिर जाते हैं, जबकि पूर्ण रूप से समर्पित भक्त कभी नहीं गिरते। जब कृष्ण देवकी के गर्भ में थे तब देवताओं ने प्रार्थना की:

तथा न ते माधव तवकः क्वचिद्

भृष्यन्ति मार्गात् त्वयि बद्ध-सौहृदः

"हे माधव, भगवान के परम व्यक्तित्व, भाग्य की देवी के भगवान, यदि आपके साथ पूरी तरह से प्यार करने वाले भक्त कभी-कभी भक्ति के मार्ग से गिर जाते हैं, तो वे अभक्तों की तरह नहीं गिरते हैं।" (भागवत 10.2.33)

यद्यपि यह कथन मानता है कि शुद्ध भक्त सैद्धांतिक रूप से नीचे गिर सकते हैं, संत अधिकारी उस संभावना को कभी स्वीकार नहीं करते हैं। परमहंस वैष्णव परमेश्वर के साथ घनिष्ठ मित्रता में दृढ़ता से स्थापित हैं; इसलिए वे किसी भी परिस्थिति में भ्रम में नहीं पड़ते।

निर्विशेषवादी सर्वोच्च आत्मा को निराकार या शून्य के रूप में कल्पना करते हैं। उनके साथ प्रत्युत्तर देने के लिए, सर्वोच्च भगवान उनकी रुचि के अनुरूप स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, जैसा कि मानवकृत वेद उनकी प्रार्थनाओं में वर्णन करते हैं। वियाता इवापादस्य तव शून्य-तुलम् दधातः: "जिस प्रकार आकाश का प्रत्यक्ष गुणों से कोई संबंध नहीं है, उसी प्रकार आप भी एक शून्य के समान हैं।" (भागवतम 10.87.29) हालाँकि, सर्वोच्च की अवैयक्तिक अवधारणा अपर्याप्त है, क्योंकि यह आत्म-प्राप्ति के सार - सर्वोच्च भगवान के चरण कमलों के लिए शुद्ध भक्ति - की उपेक्षा करती है। इस प्रकार केवल आस्थावान वैष्णव ही सच्चे संत हैं, सत्, और बाकी सभी असत् हैं। ऐसे संतों के उदाहरण का अनुसरण करते हुए, जो सफल होना चाहता है उसे वासुदेव के पुत्र की शरण लेनी चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए।

जो व्यक्ति भगवान की सुरक्षा का तिरस्कार करते हैं, वे वैष्णव नहीं हैं। आश्रय के बिना वे वास्तव में आध्यात्मिक अनाथ हैं। लेकिन वैष्णव, भगवान की सुरक्षा के तहत, भय से मुक्त, भगवान की सेवा में अपनी इंद्रियों की सभी गतिविधियों का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं, आसानी से भौतिक अस्तित्व के बंधन से मुक्ति प्राप्त करते हैं। और इससे भी आगे, हर पल वे अधिक ताज़ी और ताज़ी परमानंद की प्रचुरता का आनंद लेते हैं जिसे वे लोग कभी नहीं जान सकते जो केवल मुक्त हुए हैं। निर्विशेषवादी संन्यासी लंबे, गंभीर प्रयास के बाद ही संसार के विशाल सागर से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन परम भगवान के भक्त उस सागर को खुशी-खुशी, सहजता से पार कर जाते हैं। जैसे सृष्टि के आरंभ में कारण तत्वों के अधिष्ठाता देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की:

नमामा ते देव पदारविन्दम

प्रपन्न-तापोपशमात्पत्रम्

यन्-मूल-केता यतयो 'अञ्जसोरु-

संसार-दुःखं बहिर उत्क्षिप्ति

“हे भगवान, आपके कमल चरण समर्पित आत्माओं के लिए एक छतरी की तरह हैं, जो उन्हें भौतिक अस्तित्व के सभी दुखों से बचाते हैं। उस आश्रय के तहत सभी संत आसानी से सभी भौतिक दुखों को दूर कर देते हैं। इसलिए हम आपके कमल चरणों में सादर प्रणाम करते हैं। (भागवत 3.5.39)

जो भक्त भगवान विष्णु के चरणकमलों का पूर्ण आश्रय लेते हैं, वे सामान्य संतों या संन्यासियों की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ठ होते हैं। ऐसे भक्त किसी और चीज़ पर निर्भरता छोड़ देते हैं और केवल भगवान पर निर्भर रहते हैं। इसके विपरीत, निर्विशेषवादी संन्यासी, अपने परिवार को छोड़कर और अपनी पोशाक बदलकर, केवल भौतिकवाद का त्याग करते प्रतीत होते हैं। हालाँकि, वास्तव में, जब वे शुद्ध चेतना के अद्वैत विचार की सदस्यता लेते हैं, तो वे स्वयं को सर्वोच्च भगवान, नारायण होने की कल्पना करते हैं। मन की ऐसी स्थिति उन्हें यह मानने के लिए मजबूर करती है कि वे खुद के अलावा जो कुछ भी देखते या सुनते हैं, वह उनकी अपनी माया का एक भ्रामक उत्पाद है। अद्वैत वेदांत दर्शन के ये अनुयायी खुद को यति या संन्यासी कहते हैं, लेकिन उन्हें वैष्णवों से अलग होना चाहिए, जिन्हें भागवत वास्तविक संतों के रूप में नामित करता है।

वास्तव में अद्वैत-वादी यति अपने अतीत और वर्तमान पापों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त नहीं हैं, न ही उनके दिल इंद्रिय संतुष्टि के स्वाद से शुद्ध हुए हैं। सत्य से अनभिज्ञ होते हुए भी, वे स्वयं को विद्वान मानते हैं, और उनका व्यक्तिगत चरित्र विष्णु और उनके भक्तों के राक्षसी शत्रुओं जैसा है। जब कृष्ण गर्भ में थे तब देवताओं ने उनसे प्रार्थना की:

ये 'नये' रविंदाक्ष विमुक्त-मानिनस

त्वय अस्त-भावद अविशुद्ध-बुद्धयः

अरुह्य कृष्णेण परम पदं ततः

पतन्ति अधो 'नाद्रत-युष्मद-अंघ्रय:'

“हे कमल-नेत्र भगवान, यद्यपि अभक्त जो सर्वोच्च पद प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या और तपस्या स्वीकार करते हैं, वे स्वयं को मुक्त समझ सकते हैं, उनकी बुद्धि अशुद्ध है। वे अपनी कल्पित श्रेष्ठता की स्थिति से नीचे गिर जाते हैं क्योंकि उन्हें आपके चरणकमलों के प्रति कोई सम्मान नहीं है। (भागवत 10.2.32)

मानवकृत वेदों ने इसी तरह प्रार्थना की:

यदि न समुद्धरन्ति यतयो हृदि काम-जाता

दुरधिगमो 'सताम् हृदि गतो 'स्मृत-कण्ठ-मनिः'

असु-तृप-योगिनाम उभयतोऽप्य असुखं भगवान

अनपगतान्तकाद् अनाधिरूढ़-पादाद भवतः

“त्याग के सदस्य जो अपने हृदय में भौतिक इच्छा के अंतिम निशान को भी उखाड़ने में विफल रहते हैं, वे अशुद्ध रहते हैं, और इस प्रकार आप उन्हें आपको समझने की अनुमति नहीं देते हैं। यद्यपि आप उनके दिलों में मौजूद हैं, उनके लिए आप उस आदमी के गले में पहने हुए आभूषण की तरह हैं जो पूरी तरह से भूल गया है कि वह आभूषण वहां है। हे भगवान, जो लोग केवल इंद्रिय संतुष्टि के लिए योग का अभ्यास करते हैं, उन्हें इस जीवन में और अगले जीवन में दंड भुगतना होगा: मृत्यु से, जो उन्हें मुक्त नहीं करेगी, और आपसे, जिनके राज्य तक वे नहीं पहुंच सकते। (भागवत 10.87.39)

योग-वसिष्ठ-रामायण के अनुसार:

अज्ञानस्यार्ध-प्रबुद्धस्य

सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्

महा-नरक-जलेषु

तेनैव विनियोजितः

"जब एक अज्ञानी, अर्ध-जागरूक व्यक्ति यह घोषणा करता है कि 'सबकुछ ब्रह्म है', तो इसका परिणाम यह होता है कि वह सबसे नारकीय अस्तित्व के जाल में फंस जाता है।"

ब्रह्म-वैवर्त पुराण में भी कहा गया है:

विषय-स्नेह-संयुक्तो

ब्रह्महं इति यो वदेत्

कल्प-कोटि-सहस्राणी

नरके सा तू पच्यते

"इंद्रिय विषयों के भोग में लीन व्यक्ति जो कहता है कि 'मैं ब्रह्म हूं' वह ब्रह्मा के दस अरब दिनों तक नरक में जलेगा।"

और एक अन्य पुराण में हम पढ़ते हैं:

संसार-सुख-संयुक्तम्

ब्रह्महं इति वादिनम्

कर्म-ब्रह्म-परिभ्रष्टम्

तम् त्यजेद अन्त्यजम् यथा

“यदि कोई व्यक्ति भौतिक जीवन के सुखों में डूबा हुआ कहता है, 'मैं ब्रह्म हूं', तो वह वैदिक कर्तव्यों और पारलौकिक व्यस्तताओं दोनों से गिर गया है। उसे एक जाति-बहिष्कृत की तरह खारिज कर दिया जाना चाहिए।”

सरूपा से मिलने से पहले, मथुरा का ब्राह्मण परम भगवान की भक्ति सेवा की महिमा से अनभिज्ञ था। लेकिन अपने संत आध्यात्मिक गुरु, सरूपा की संगति से, वह तुरंत उतने ही सफल हो गए, जितने लंबे अनुशासित प्रयासों के बाद अपनी आध्यात्मिक पहचान का एहसास करते हैं। शुद्ध वैष्णवों के साथ संगति की शक्ति ऐसी है। पहले इस पुस्तक में सभी प्रकार की आध्यात्मिक प्रथाओं की व्याख्या की गई थी, लेकिन वैष्णव संघ की यह विशेष महिमा नहीं थी। वैष्णव संगति सबसे उत्कृष्ट रहस्य है। यह आध्यात्मिक प्राप्ति का सबसे अच्छा साधन है और वास्तव में अंतिम लक्ष्य का एक अनिवार्य पहलू है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)