श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.7.135 
गोप्यस् तपः किम् अचरन् यद् अमुष्य रूपं
लावण्य-सारम् असमोर्ध्वम् अनन्य-सिद्धम्
दृग्भिः पिबन्त्य् अनुसवाभिनवं दुरापम्
एकान्त-धाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य
 
 
अनुवाद
"गोपियों ने कैसी तपस्या की होगी! वे अपनी आँखों से सदैव भगवान कृष्ण के रूप का रसपान करती रहती हैं, जो कि परम सौंदर्य है और जिसकी बराबरी या उससे बढ़कर कुछ नहीं किया जा सकता। वह सौंदर्य ही सौन्दर्य, यश और ऐश्वर्य का एकमात्र निवास है। वह स्वयंसिद्ध, नित्य नवीन और अत्यंत दुर्लभ है।"
 
"What penance the gopis must have performed! Their eyes always feast on the form of Lord Krishna, which is supreme beauty and nothing can equal or surpass it. That beauty is the only abode of beauty, fame and splendor. It is self-evident, ever new and extremely rare."
तात्पर्य
पाठ 135 से 137 (भागवतम् 10.44.14-16) मथुरा की महिलाएँ बोलती हैं जो कृष्ण को देखती हैं जैसे वो कंस की अखाड़े में चानूर के साथ कुश्ती लड़ने के लिए प्रवेश करते हैं। मथुरा की महिलाएं वृंदावन की गोपियों की प्रशंसा करती हैं क्योंकि गोपियाँ हर परिस्थिति में कृष्ण को देखने और उनकी महिमा का गुणगान करने का आनंद ले सकती हैं।

सबसे पहले महिलाएं गोपियों की हमेशा कृष्ण के दिव्य रूप की सुंदरता देखने में सक्षम होने के लिए प्रशंसा करती हैं। वैदिक शास्त्र विभिन्न प्रकार के अनुशासनों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले विभिन्न लाभों की व्याख्या करते हैं, लेकिन मथुरा की महिलाओं ने कभी किसी को भी गोपियों को दिए गए ऐसे लाभ प्राप्त करते नहीं सुना है। क्या तपस्या, धार्मिक कर्तव्य या ध्यान किसी को ऐसी सिद्धि प्राप्त करने में सक्षम बना सकते हैं? व्रज की गोपियों ने कृष्ण की सुंदरता को अपनी नश्वर आँखों से पीने, उनकी सुंदरता का ज़्यादा स्वाद लेने के लिए सीधे ज़ुबान से अमृत का आनंद लेने के लिए क्या तप किया होगा? कृष्ण के प्रति सम्मान के कारण, इस क्षण शहर की महिलाएं उनका नाम नहीं बोल सकती हैं, लेकिन केवल नंद के पुत्र को "उन" के रूप में संदर्भित कर सकती हैं।

मथुरा की महिलाओं के वर्णन के अनुसार, कृष्ण सबसे आकर्षक व्यक्ति हैं। वास्तव में, वे आकर्षण के सार को ही मूर्त रूप देते हैं। यहां तक कि जो लोग उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं, वे भी उनके समान कोई अवतार नहीं पा सकते हैं; और जो लोग जानते हैं कि वे वास्तव में सभी अवतारों के स्रोत हैं, वे समझ सकते हैं कि कोई भी महान नहीं है। इसके अलावा, उनकी सर्वोच्च श्रेष्ठता किसी के द्वारा या किसी अन्य चीज़ द्वारा नहीं बनाई गई है। उनकी श्रेष्ठता उन्हें उनके आभूषणों द्वारा प्रदान नहीं की गई है; यह स्वाभाविक रूप से उनकी है। जैसा कि श्री उद्धव ने श्रीमद-भागवतम् (3.2.12) के तीसरे कांटो में कहा है:

yan martya-līlaupayikaṁ sva-yoga-

māyā-balaṁ darśayatā gṛhītam

vismāpanaṁ svasya ca saubhagarddheḥ

paraṁ padaṁ bhūṣaṇa-bhūṣaṇāṅgam

"प्रभु, अपनी आंतरिक शक्ति, योगमाया द्वारा, अपनी शाश्वत रूप में नश्वर दुनिया में प्रकट हुए, बस उनके पास्टाइम के लिए उपयुक्त। वो पास्टाइम सभी के लिए चमत्कारिक थे, यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जो अपने धन पर गर्व करते थे, जिसमें स्वयं भगवान वैकुण्ठ के रूप में प्रभु भी शामिल थे। इस प्रकार श्री कृष्ण का दिव्य शरीर सभी आभूषणों का आभूषण है।"

अनन्य-सिद्धम को दूसरे तरीके से भी समझा जा सकता है, जिसका अर्थ है कि कृष्ण की ये श्रेष्ठताएँ व्रज के अलावा कहीं और प्राप्त नहीं की जाती हैं। इसके अलावा, जो लोग कृष्ण की महिमा का स्वाद लेते हैं, वे कभी तृप्त नहीं होते हैं; बल्कि, वे हमेशा उन महिमाओं को हर पल नया और नया अनुभव करते हैं। जैसा कि कवि माघ कहते हैं, क्षणे क्षणे यन नवतामुपैति / तदेव रूपं रमणीयतायाः: "आकर्षण का असली रूप वह है जो हर पल नया दिखता है।" इसलिए कृष्ण की पूर्ण महिमा को समझना बहुत कठिन है; गोपियों के अलावा, कोई भी सीधे उन्हें जानने की उम्मीद नहीं कर सकता। और केवल गोपियों के पास कृष्ण पूरी तरह से उनके नियंत्रण में हैं।

कृष्ण सबसे आकर्षक व्यक्ति हैं, और उनके पास सभी सर्वोच्च गुण हैं। वह प्रसिद्धि, वैभव और भगवान शब्द द्वारा दर्शाए गए छह दिव्य वैभवों का एकमात्र निरंतर भंडार हैं। इस प्रकार उनका रूप और उनका व्यक्तित्व दोनों ही सभी प्रकार से अत्यंत आकर्षक हैं।

यह कहते हुए कि व्रज की गोपियाँ हमेशा कृष्ण की सुंदरता के दर्शन का आनंद लेती हैं, कुश्ती के मैदान में बोलने वाली महिलाएं वर्तमान काल (पिबंति) का उपयोग करती हैं। इसके द्वारा वे यह कहना चाहती हैं कि कृष्ण की सुंदरता वास्तव में गोपियों को कभी नहीं छोड़ती है, क्योंकि गोपियाँ उन्हें देखने में कभी असफल नहीं होती हैं, तब भी जब वे शारीरिक रूप से अनुपस्थित होते हैं। "गोपियाँ सबसे भाग्यशाली महिलाएँ हैं। हम मथुरा की महिलाएँ बिलकुल भी पवित्र नहीं हैं, क्योंकि हम उन्हें केवल अशुभ समय और स्थानों पर ही देख सकती हैं। हमारे लिए गोपियों के समान प्रेम और सम्मान के साथ उनकी सुंदरता के अमृत को पीने का कोई मौका नहीं है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)