सबसे पहले महिलाएं गोपियों की हमेशा कृष्ण के दिव्य रूप की सुंदरता देखने में सक्षम होने के लिए प्रशंसा करती हैं। वैदिक शास्त्र विभिन्न प्रकार के अनुशासनों द्वारा प्राप्त किए जाने वाले विभिन्न लाभों की व्याख्या करते हैं, लेकिन मथुरा की महिलाओं ने कभी किसी को भी गोपियों को दिए गए ऐसे लाभ प्राप्त करते नहीं सुना है। क्या तपस्या, धार्मिक कर्तव्य या ध्यान किसी को ऐसी सिद्धि प्राप्त करने में सक्षम बना सकते हैं? व्रज की गोपियों ने कृष्ण की सुंदरता को अपनी नश्वर आँखों से पीने, उनकी सुंदरता का ज़्यादा स्वाद लेने के लिए सीधे ज़ुबान से अमृत का आनंद लेने के लिए क्या तप किया होगा? कृष्ण के प्रति सम्मान के कारण, इस क्षण शहर की महिलाएं उनका नाम नहीं बोल सकती हैं, लेकिन केवल नंद के पुत्र को "उन" के रूप में संदर्भित कर सकती हैं।
मथुरा की महिलाओं के वर्णन के अनुसार, कृष्ण सबसे आकर्षक व्यक्ति हैं। वास्तव में, वे आकर्षण के सार को ही मूर्त रूप देते हैं। यहां तक कि जो लोग उन्हें विष्णु का अवतार मानते हैं, वे भी उनके समान कोई अवतार नहीं पा सकते हैं; और जो लोग जानते हैं कि वे वास्तव में सभी अवतारों के स्रोत हैं, वे समझ सकते हैं कि कोई भी महान नहीं है। इसके अलावा, उनकी सर्वोच्च श्रेष्ठता किसी के द्वारा या किसी अन्य चीज़ द्वारा नहीं बनाई गई है। उनकी श्रेष्ठता उन्हें उनके आभूषणों द्वारा प्रदान नहीं की गई है; यह स्वाभाविक रूप से उनकी है। जैसा कि श्री उद्धव ने श्रीमद-भागवतम् (3.2.12) के तीसरे कांटो में कहा है:
yan martya-līlaupayikaṁ sva-yoga-
māyā-balaṁ darśayatā gṛhītam
vismāpanaṁ svasya ca saubhagarddheḥ
paraṁ padaṁ bhūṣaṇa-bhūṣaṇāṅgam
"प्रभु, अपनी आंतरिक शक्ति, योगमाया द्वारा, अपनी शाश्वत रूप में नश्वर दुनिया में प्रकट हुए, बस उनके पास्टाइम के लिए उपयुक्त। वो पास्टाइम सभी के लिए चमत्कारिक थे, यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जो अपने धन पर गर्व करते थे, जिसमें स्वयं भगवान वैकुण्ठ के रूप में प्रभु भी शामिल थे। इस प्रकार श्री कृष्ण का दिव्य शरीर सभी आभूषणों का आभूषण है।"
अनन्य-सिद्धम को दूसरे तरीके से भी समझा जा सकता है, जिसका अर्थ है कि कृष्ण की ये श्रेष्ठताएँ व्रज के अलावा कहीं और प्राप्त नहीं की जाती हैं। इसके अलावा, जो लोग कृष्ण की महिमा का स्वाद लेते हैं, वे कभी तृप्त नहीं होते हैं; बल्कि, वे हमेशा उन महिमाओं को हर पल नया और नया अनुभव करते हैं। जैसा कि कवि माघ कहते हैं, क्षणे क्षणे यन नवतामुपैति / तदेव रूपं रमणीयतायाः: "आकर्षण का असली रूप वह है जो हर पल नया दिखता है।" इसलिए कृष्ण की पूर्ण महिमा को समझना बहुत कठिन है; गोपियों के अलावा, कोई भी सीधे उन्हें जानने की उम्मीद नहीं कर सकता। और केवल गोपियों के पास कृष्ण पूरी तरह से उनके नियंत्रण में हैं।
कृष्ण सबसे आकर्षक व्यक्ति हैं, और उनके पास सभी सर्वोच्च गुण हैं। वह प्रसिद्धि, वैभव और भगवान शब्द द्वारा दर्शाए गए छह दिव्य वैभवों का एकमात्र निरंतर भंडार हैं। इस प्रकार उनका रूप और उनका व्यक्तित्व दोनों ही सभी प्रकार से अत्यंत आकर्षक हैं।
यह कहते हुए कि व्रज की गोपियाँ हमेशा कृष्ण की सुंदरता के दर्शन का आनंद लेती हैं, कुश्ती के मैदान में बोलने वाली महिलाएं वर्तमान काल (पिबंति) का उपयोग करती हैं। इसके द्वारा वे यह कहना चाहती हैं कि कृष्ण की सुंदरता वास्तव में गोपियों को कभी नहीं छोड़ती है, क्योंकि गोपियाँ उन्हें देखने में कभी असफल नहीं होती हैं, तब भी जब वे शारीरिक रूप से अनुपस्थित होते हैं। "गोपियाँ सबसे भाग्यशाली महिलाएँ हैं। हम मथुरा की महिलाएँ बिलकुल भी पवित्र नहीं हैं, क्योंकि हम उन्हें केवल अशुभ समय और स्थानों पर ही देख सकती हैं। हमारे लिए गोपियों के समान प्रेम और सम्मान के साथ उनकी सुंदरता के अमृत को पीने का कोई मौका नहीं है।"
