श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.7.135 
गोप्यस् तपः किम् अचरन् यद् अमुष्य रूपं
लावण्य-सारम् असमोर्ध्वम् अनन्य-सिद्धम्
दृग्भिः पिबन्त्य् अनुसवाभिनवं दुरापम्
एकान्त-धाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य
 
 
अनुवाद
"गोपियों ने कैसी तपस्या की होगी! वे अपनी आँखों से सदैव भगवान कृष्ण के रूप का रसपान करती रहती हैं, जो कि परम सौंदर्य है और जिसकी बराबरी या उससे बढ़कर कुछ नहीं किया जा सकता। वह सौंदर्य ही सौन्दर्य, यश और ऐश्वर्य का एकमात्र निवास है। वह स्वयंसिद्ध, नित्य नवीन और अत्यंत दुर्लभ है।"
 
"What penance the gopis must have performed! Their eyes always feast on the form of Lord Krishna, which is supreme beauty and nothing can equal or surpass it. That beauty is the only abode of beauty, fame and splendor. It is self-evident, ever new and extremely rare."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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