"मेरे प्रिय राजन, अन्य बालक अवसर के अनुरूप गीत गाते थे, जो कृष्ण को मोहित कर लेते थे, और बालकों के हृदय उनके प्रति प्रेम से पिघल जाते थे।"
"My dear King, the other children sang songs appropriate to the occasion, which captivated Krishna, and the children's hearts melted with love for Him."
तात्पर्य
कुछ कृष्ण के मित्रों ने मीठी, कोमल धुनों के साथ गाने गाए जो कि उनकी झपकी के समय के लिए उपयुक्त थे। इसने उन्हें जल्दी सो जाने के लिए प्रोत्साहित किया। कृष्ण सबसे उन्नत व्यक्तियों में हैं, जो लाखों महासागरों की संयुक्त गहराई से भी अधिक गंभीर हैं, लेकिन ये गाने उन्हें इसलिए मोहित करते थे क्योंकि वे गोपियों के साथ उनके प्रेमपूर्ण व्यवहार का वर्णन करते थे। और उनके मन को उन गीतों के उन हिस्सों से भी बहुत आकर्षित किया जाता था जो केवल सामान्य तरीकों से उनकी भक्ति सेवा की महिमा करते थे। ऐसा हो सकता है कि यहाँ शुकदेव गोस्वामी ने विडंबनापूर्ण रूप से महात्मा का प्रयोग किया है। अपने आनंद को नियंत्रित करने में असमर्थ, शुकदेव कृष्ण को "महान आत्मा" कहते हैं इस समझ के साथ कि कृष्ण वास्तव में महिलाओं के शौकीनों के राजकुमार हैं, जो ग्वालों की बेटियों के कपड़े चुराकर, उन्हें उनके सामने नग्न करके, लाज़रहित रूप से अपनी कामुक प्रवृत्तियों में लिप्त रहते हैं। कृष्ण के मित्रों द्वारा उनके आनंद के लिए गाए गए गीतों ने तीव्र प्रेम को प्रेरित किया, जिससे लड़कों के दिल पिघल गए। उन्होंने धीरे से गाया, उनकी आवाज़ उमंग के आँसुओं से भर गई। इससे हम जान सकते हैं कि यद्यपि कृष्ण के लिए पवित्र प्रेम सभी प्रकार की भक्ति सेवा के दौरान उत्पन्न होता है, लेकिन यह सबसे जल्दी और पूरी तरह से प्रकट होता है जब कोई कीर्तन करता है, कृष्ण के प्रिय गीत गाता है और अन्यथा उनके नाम और प्रसिद्धि की महिमा करता है। जैसा कि पिछले पद में कहा गया है, जो लड़के कृष्ण की सेवा करते थे जब वह विश्राम कर रहे थे, हत-पापमानाह, "सभी पापों से मुक्त" थे। वे महान आत्माएं थीं, भक्ति सेवा में अत्यधिक उन्नत थीं, प्रत्येक पूरे ब्रह्मांड को शुद्ध करने में सक्षम था। इस प्रकार जब उन्होंने कृष्ण के लिए अपनी व्यक्तिगत सेवाएँ कीं तो उन्होंने उनके लिए और अधिक प्रेम महसूस किया, और उनके हृदय उमंग में पिघल गए। और फिर शब्द महात्मा कृष्ण और उनके मित्रों दोनों पर समान रूप से लागू होता है। इस श्लोक में श्रील शुकदेव ने राजा परीक्षित को महा-राजा कहकर संबोधित किया है। इसका मतलब यह हो सकता है कि शाही अंदाज में सेवा किए जाने वाले कृष्ण का मनोरंजन एक राजा को सुनने के लिए उपयुक्त है। या इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि परीक्षित महाराज जैसे राजा शायद ही इस तरह के शानदार आराम की उम्मीद कर सकते हैं। या परीक्षित को ग्वाले लड़कों के सर्वोच्च भाग्य का वर्णन करना श्री शुकदेव के हृदय में प्रेममय भावनाओं का एक प्रकोप पैदा करता है जो उन्हें राजा का ध्यान आकर्षित करने के लिए परीक्षित को महा-राजा कहने के लिए प्रेरित करता है, जो पवित्र प्रेम के विचलन से भी अभिभूत है। या शुकदेव परीक्षित को महा-राजा, शाही वर्ग का श्रेष्ठ कहते हैं, क्योंकि केवल राजा परीक्षित ही इन ग्वाले लड़कों के उदात्त सौभाग्य को समझने में सक्षम हैं। या फिर यह शब्द इस बात का संकेत हो सकता है कि ग्वाले लड़कों द्वारा कृष्ण के लिए पोषित स्नेह अत्यंत शानदार है; यह प्रेमपूर्ण भावनाओं का महा-राजा है। हालांकि यह स्नेह या प्रेम हमेशा लड़कों के भीतर मौजूद रहता है, घनिष्ठ सेवा की इस स्थापना में यह अब अपनी शक्ति के शिखर पर पहुँच जाता है। यह अनंत चमक के साथ चमकता है, सभी संदूषण को बहुत पीछे छोड़ देता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥