श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 98
 
 
श्लोक  2.6.98 
भोग्यं च निभृतं किञ्चिद्
भोजयित्वोक्त-वस्तुभिः
मुहुर् नीराजनं कृत्वा
दधुस् तानि स्व-मूर्धसु
 
 
अनुवाद
उन्होंने चुपके से उसे कुछ खिलाया, निर्धारित वस्तुओं से बार-बार उसकी पूजा की, और फिर उन वस्तुओं को अपने सिर पर रख लिया।
 
They secretly fed him something, worshipped him repeatedly with the prescribed objects, and then placed those objects on their heads.
तात्पर्य
गोपियां छिपकर कृष्ण को माखन एवं अन्य उत्तम भोजनों का भोग कराती थीं। वे अपने इन कार्यों को अति गोपनीय रखना चाहती थीं और विशेष रूप से वे यशोदा को यह पता चलने से रोकना चाहती थीं क्योंकि यदि उन्हें पता चलता तो वे क्रोधित होतीं, क्योंकि भोजन के समय के अतिरिक्त कृष्ण को भोजन कराया जा रहा था और इससे उन्हें अपच हो सकती थी। उसे खिलाने के पश्चात्‌, गोपियाँ दीपों और सरसों के बीजों जैसी सभी सामग्रियों से उसकी पूजा करती थीं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)