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श्लोक 2.6.76  |
चिरादृष्ट-प्राण-प्रिय-सखम् इवावाप्य स तु मां
करे धृत्वा वाम-स्व-कर-कमलेन प्रभु-वरः
विचित्रं सम्प्रश्नं विदधद् अखिलांस् तान् व्रज-जनान्
समानन्द्य श्रीमान् अविशद् इभ-गामी व्रज-वरम् |
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| अनुवाद |
| उन भगवान् श्रेष्ठ ने मेरा हाथ अपने बाएँ कमल-हस्त में लेकर मुझे एक चिर-परिचित आत्मीय मित्र की तरह ग्रहण किया। उन्होंने मुझसे अनेक प्रश्न पूछे। तत्पश्चात् उन्होंने समस्त व्रजवासियों का अभिवादन किया और हाथी की चाल से उत्तम गोप-ग्राम में प्रवेश किया। |
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| That great Lord took my hand in his left lotus hand and welcomed me as a long-known, close friend. He asked me many questions. Then he greeted all the residents of Vraja and entered the excellent Gopa village with the gait of an elephant. |
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