श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  2.6.75 
सद्यो ’श्रु-धारा-परिमुद्रिते ते
श्री-नेत्र-पद्मे उदमीलयत् सः
मां वीक्ष्य हर्षात् परिरभ्य चुम्बन्
लज्जाम् अगच्छत् परितो ’वलोक्य
 
 
अनुवाद
अचानक कृष्ण ने अपनी आँखें खोलीं, जो अब तक आँसुओं की बाढ़ से बंद थीं। मुझे देखकर, उन्होंने खुशी से मुझे गले लगाया और चूमा। लेकिन फिर उन्होंने इधर-उधर देखा और शर्मिंदा हो गए।
 
Suddenly, Krishna opened his eyes, which had been closed by a flood of tears. Seeing me, he happily embraced and kissed me. But then he looked away and became embarrassed.
तात्पर्य
कृष्ण, अपने मित्र से प्रेम के वशीभूत हो गए थे, और गोपा-कुमार के आने पर उनके साथ प्रतिक्रिया से उनकी भावनाओं को प्रत्येक देख सकता था, यह सोचकर वे संकोच कर रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)