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श्लोक 2.6.5  |
कदाचिद् एवं किल निश्चिनोम्य् अहं
शठस्य हस्ते पतितो ’स्मि कस्यचित्
सदा न्यमञ्जं बहु-दुःख-सागरे
सुखस्य गन्धो ’पि न मां स्पृशेत् क्वचित् |
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| अनुवाद |
| कभी-कभी मुझे लगता था कि मैं किसी बड़े धोखेबाज़ के हाथों में पड़ गया हूँ। मैं हमेशा दुख के अथाह सागर में डूबा रहता था। खुशी की एक बूँद भी मुझे कभी छू नहीं पाती थी। |
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| Sometimes I felt like I'd fallen into the hands of a swindler. I was always drowning in a vast ocean of sorrow. Not even a drop of happiness could ever touch me. |
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