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श्लोक 2.6.4  |
कथञ्चिद् अप्य् आकलयामि नैतत्
किम् एष दावाग्नि-शिखान्तरे ’हम्
वसामि किं वा परमामृताच्छ-
सु-शीतल-श्री-यमुना-जलान्तः |
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| अनुवाद |
| मैं यह नहीं बता सकता था कि मैं दावानल की लपटों में रह रहा था या श्री यमुना के स्वच्छ, शीतल जल के परम अमृत में। |
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| I could not tell whether I was living in the flames of a forest fire or in the ultimate nectar of the clean, cool waters of Shri Yamuna. |
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