श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 378
 
 
श्लोक  2.6.378 
कदाचिद् दर्शनं वा स्याद्
वैकुण्ठादि-निवासिनाम्
श्री-कृष्ण-विरहेणार्तान्
इव पश्यामि तान् अपि
 
 
अनुवाद
समय-समय पर मैं वैकुंठ या किसी अन्य स्थान के निवासियों को देखता हूँ, किन्तु मेरी दृष्टि में वे श्रीकृष्ण के वियोग से पीड़ित प्रतीत होते हैं।
 
From time to time I see the inhabitants of Vaikuntha or some other place, but to me they appear to be suffering from separation from Sri Krishna.
तात्पर्य
श्री सरूप का दृष्टिकोण व्रज-भाव, व्रज के भाव में स्थित एक परमहंस का है | वे प्रत्येक व्यक्ति को, यहाँ तक कि बाहरी लोगों को भी इस भाव में देखते हैं | जब वे द्वारिका, अयोध्या, और बैकुंठ से आये भक्तों से मिलते हैं, तो वे उन पर अपनी भावनाओं को प्रक्षेपित करते हैं और यह मान लेते हैं कि वे व्रज में कृष्ण के साथ न होने पर भी दुखी हैं | इस प्रकार, सरूप को कुछ भी गोलोक के गौरव पर अपने ध्यान से विचलित नही कर सकता है, और वे सभी परिस्थितियों में संतुष्ट रहते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)