श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 376
 
 
श्लोक  2.6.376 
अस्मात् स्थान-द्वयाद् अन्यत्
पदं किञ्चित् कथञ्चन
नैव स्पृशति मे दृष्टिः
श्रवणं वा मनो ’पि वा
 
 
अनुवाद
न तो मेरी दृष्टि, न मेरी श्रवणशक्ति, और न ही मेरा मन कभी भी इन दोनों के अलावा किसी अन्य धाम को स्पर्श करता है।
 
Neither my sight, nor my hearing, nor my mind ever touches any other abode than these two.
तात्पर्य
श्री सारूप कृष्णचरण एवं उनके धाम के प्रति अनन्य अनुराग से युक्त होकर अन्य सबको भूल बैठे हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)