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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)
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श्लोक 366
श्लोक
2.6.366
तल्-लोकस्य स्वभावो ’यं
कृष्ण-सङ्गं विनापि यत्
भवेत् तत्रैव तिष्ठासा
न चिकीर्षा च कस्यचित्
अनुवाद
गोलोक, कृष्ण के लोक, का यही स्वभाव है। उनकी अनुपस्थिति में भी यहाँ के निवासी यहीं रहना चाहते हैं। कोई भी कहीं और नहीं जाना चाहता।
This is the nature of Goloka, Krishna's abode. Even in his absence, its residents want to stay here. No one wants to go anywhere else.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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