श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 355
 
 
श्लोक  2.6.355 
एवं पुनः पुनर् याति
तत्-पुरे पूर्व-पूर्व-वत्
पुनः पुनः समायाति
व्रजे क्रीडेत् तथैव सः
 
 
अनुवाद
इस प्रकार कृष्ण बार-बार कंस की नगरी में जाते हैं, जैसा कि वे पहले भी कई बार कर चुके हैं, और बार-बार व्रज में क्रीड़ा करने के लिए लौट आते हैं।
 
Thus Krishna repeatedly goes to Kamsa's city, as he has done many times before, and repeatedly returns to play in Vraja.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)