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श्लोक 2.6.35  |
क्षणात् तेनैव वृद्धेन
चेतितो ’हं दयालुना
धावन्न् अग्रे ’भिसृत्यास्या
न्यषीदं गोपुरे पुरः |
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| अनुवाद |
| एक क्षण बाद उस दयालु वृद्ध व्यक्ति ने मुझे होश में लाया और मैं दौड़कर आगे बढ़ा और नगर के एक प्रवेशद्वार के पास जाकर द्वार पर बैठ गया। |
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| After a moment the kind old man brought me back to my senses and I ran forward and went to one of the entrances of the city and sat at the door. |
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