श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 346
 
 
श्लोक  2.6.346 
तेनैव विप्र-प्रवरेण यत्नतो
नीतो मनाक् स्वास्थ्यम् इव स्व-युक्तिभिः
आशङ्क्य मोहं पुनर् आत्मनो ’धिकं
वार्तां विशेषेण न ताम् अवर्णयत्
 
 
अनुवाद
श्रेष्ठ ब्राह्मण ने बड़ी सावधानी से सरूपा को कुछ हद तक सामान्य स्थिति में पहुँचाया। और सरूपा, पुनः भ्रमित होने के भय से, उस विषय पर और कुछ नहीं बोली।
 
The great Brahmin carefully brought Sarupa back to some semblance of normalcy. And Sarupa, fearing to be confused again, spoke no more on the subject.
तात्पर्य
मथुरा के ब्राह्मण ने अपने गुरु को बाहरी होश में लाने के लिए उन्हें पुकारा, उनके चरण स्पर्श किये और उन पर पानी के छींटे मारे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)