श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  2.6.30 
परितश् चालयंश् चक्षुः
पुरीम् एकां विदूरतः
अद्राक्षं माधुरी-सार-
परीपाकेण सेविताम्
 
 
अनुवाद
चारों ओर देखते हुए, मैंने दूरी पर एक शहर देखा जो सभी प्रकार की मधुरता से सुशोभित था।
 
Looking around, I saw a city in the distance adorned with all kinds of sweetness.
तात्पर्य
भौतिक और आध्यात्मिक लोकों में गोपा-कुमार द्वारा देखे गए अन्य लोक भी अपने तरीके से महान थे, लेकिन उनमें से कोई भी, वैकुण्ठ भी नहीं, इतना आकर्षक नहीं था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)