श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 295
 
 
श्लोक  2.6.295 
दूरं गते तत्-पुरम् आज्ञया पुनः
कंसस्य दुष्टस्य तद्-इष्ट-सङ्गतः
जीवेम नाना-विध-शङ्कयाकुलाः
कथं प्रवासार्ति-विचिन्तनेन च
 
 
अनुवाद
परन्तु यदि आप दुष्ट कंस के आदेश पर इतनी दूर नगर और उसके मित्रों के बीच चले जाएँ, तो हम कैसे जीवित रह पाएँगे? घर से दूर आपको जो कष्ट होगा और आपके साथ क्या घटित होगा, यह सोचकर हम नाना प्रकार की चिंताओं से व्याकुल हो जाएँगे।
 
But if you, at the command of the wicked Kansa, go so far away to the city and among his friends, how will we survive? The thought of the hardships you will face and the things that will happen to you far from home will overwhelm us with various worries.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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