श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 293
 
 
श्लोक  2.6.293 
कथं तवेदं स्मित-सुन्दराननं
मनोहरं पाद-सरोरुह-द्वयम्
उरः-स्थलं चाखिल-शोभयार्चितं
कुतो ’प्य् अनालोक्य चिरं म्रियेमहि
 
 
अनुवाद
यदि हम कहीं भी आपका सुन्दर मुस्कुराता हुआ मुख, आपके सर्व-आकर्षक चरण-कमल तथा समस्त तेज से सुशोभित आपका वक्षस्थल न देख सकें, तो हम धीमी मृत्यु कैसे न मरें?
 
If we cannot see anywhere Your beautiful smiling face, Your all-attractive lotus feet and Your chest adorned with all radiance, how can we not die a slow death?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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