श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 292
 
 
श्लोक  2.6.292 
वनं गृहं नो ’भवद् आलयो वनं
द्विषत् सुहृद् बन्धु-गणाश् च वैरिणः
विषं च पीयूषम् उतामृतं विषं
यद्-अर्थम् अस्मात् त्वद् ऋते म्रियामहे
 
 
अनुवाद
आपके लिए, जंगल हमारे घर बन गए हैं, हमारे घर जंगल बन गए हैं, हमारे दुश्मन हमारे दोस्त बन गए हैं, हमारे दोस्त दुश्मन बन गए हैं, मीठा अमृत भी ज़हर बन गया है और अमृत भी ज़हर बन गया है। आपके बिना हम मर जाएँगे।
 
For you, the jungle has become our home, our home has become the jungle, our enemies have become our friends, our friends have become our enemies, sweet nectar has become poison, and nectar has become poison. Without you, we will die.
तात्पर्य
गोपियों को विश्‍वास है कि अगर कृष्‍ण उनकी प्रार्थना स्‍वीकार करने से इंकार करते हैं तो वे बहुत जल्‍दी मर जाएँगी। आखिरकार, क्‍या कृष्‍ण ने उनका जीवन ही उलट-पुलट नहीं कर दिया था? जंगल उनके घर थे, क्‍योंकि जंगलों में वे कृष्‍ण के साहचर्य का आनंद उठाती थीं। और उनके घर एक खाली मैदान की तरह थे, क्‍योंकि कृष्‍ण वहाँ नहीं थे। कृष्‍ण के स्‍नेह के लिए उनके प्रतिद्वंद्वी वास्‍तव में उनके मित्र थे, क्‍योंकि उन मित्रों की मदद से वे कृष्‍ण से मिल पाती थीं। और गोपियों को कृष्‍ण के पास जाने से रोककर, उनके पतियों और बच्‍चों ने दुश्‍मन जैसा व्‍यवहार किया। वास्‍तव में गोपियों का कृष्‍ण के प्रति प्रेम इतना शक्तिशाली था कि वह जहरीले पदार्थों को भी सबसे स्‍वादिष्‍ट अमृत में बदल देता था। और वियोग की पीड़ा में मरने के लिए उत्‍सुक गोपियों के लिए जहर आकर्षक बन गया। चाँदनी, चंदन का पेस्‍ट और अच्‍छा खाना जैसी अमृतोपम चीजें गोपियों के लिए जहर जैसी थीं, क्‍योंकि ऐसी चीजों से मिलने वाला सुख कृष्‍ण के साथ उनके जुड़ाव में बाधा डालता था और जब वे उनसे अलग होने का दुख झेल रही थीं तो उनके कथित सुख असहनीय हो जाते थे। श्री नारद पहले ही गोप-कुमार को समझा चुके हैं कि कृष्‍ण के प्रति शुद्ध प्रेम ने गोपियों को इन विचित्र तरीकों से क्‍यों प्रभावित किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)