श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 239
 
 
श्लोक  2.6.239 
प्राणैर् वियुक्ता न भवन्ति यावत्
तावद् विनोदं करुण त्यजैतम्
कृष्णान्यथा गोष्ठ-जनैक-बन्धो
गन्तासि शोकं मृदुल-स्वभावः
 
 
अनुवाद
हे दयालु कृष्ण, इन भक्तों के मरने से पहले कृपया यह खेल छोड़ दीजिए! अन्यथा, हे कृष्ण, ग्वालों के एकमात्र मित्र, आपका कोमल हृदय दुःखी हो जाएगा।
 
O merciful Krishna, please stop this game before these devotees die! Otherwise, O Krishna, the only friend of the cowherds, your tender heart will be grieved.
तात्पर्य
कृष्ण सभी रसों के भंडार हैं और इसलिए वह करुण-रस भी महसूस करते हैं। लेकिन यद्यपि वह निर्जीव होने का नाटक करने के खेल का आनंद लेते हैं, उनके भक्त इससे निराशा की स्थिति में चले जाते हैं। यदि वह यह खेल नहीं छोड़ते हैं, तो अंत में विलाप करने वाले वह ही होंगे - जब उनके सभी भक्त मर चुके होंगे। भगवान बलराम कृष्ण की भावनाओं पर खेल रहे हैं क्योंकि वह जानते हैं कि कृष्ण अपने भक्तों को दुखी होते नहीं देख सकते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)