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श्लोक 2.6.226  |
आक्रन्द-दीना विहगा ह्रदस्य
तस्यान्तर् उड्डीय पतन्ति वेगात्
वृक्षादयस् तत्-क्षणम् एव शोषं
प्राप्ता महोत्पात-चयाश् च जाताः |
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| अनुवाद |
| ज़ोर-ज़ोर से रोने से थके हुए पक्षी तेज़ी से झील में उड़ गए। पेड़-पौधे अचानक सूख गए। और कई भयानक अपशकुन दिखाई देने लगे। |
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| The birds, exhausted by their loud cries, flew swiftly into the lake. The trees and plants suddenly withered. And many terrible omens began to appear. |
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