श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 221
 
 
श्लोक  2.6.221 
एकाकी तत्र गत्वाशु
नीपम् आरुह्य वेगतः
कूर्दित्वा निपपातास्मिन्
ह्रदे निःसारयन्न् अपः
 
 
अनुवाद
कृष्ण अकेले ही वहाँ पहुंचे, तेजी से एक नीप वृक्ष पर चढ़ गए, और झील में कूद पड़े, जिससे किनारे पर पानी उछलने लगा।
 
Krishna arrived there alone, quickly climbed a neep tree, and jumped into the lake, causing the water to splash on the shore.
तात्पर्य
कृष्ण ने सोचा कि कालिया की झील, जो फिर से विषाक्त हो गई थी, में अपने साथियों को न लाना ही समझदारी होगी। उन्हें यह भी चिंता थी कि वे उन्हें झील में कूदने से रोकने की कोशिश कर सकते हैं। कृष्ण के उस जोशपूर्ण तरीके का वर्णन श्रीमद-भागवतम (10.16.7) में इस प्रकार किया गया है:

सर्प-ह्रद : पुरुष-सार-निपात-वेग-

संक,भोभितोरग-विषोच्छ्वसिताम्बु-राशि:

परूयक-प्लुतो विष-कषाय-बिभीषर् -

धात्रं धनु: -शतं अनंत-बलस्य कि तत

“जब भगवान ने सर्प की झील में प्रवेश किया, तो वहाँ के सर्प अत्यधिक उत्तेजित हो गए और जोर-जोर से साँस लेना शुरू कर दिया, जिससे वह और भी ज़हरीली हो गई। झील में भगवान के प्रवेश के वेग ने उसके चारों ओर पानी बहने से उसमे उफान भर दिया, और जहरीली, भयावह लहरों ने आसपास की भूमि को सौ धनुष की दूरी तक भर दिया। हालाँकि, यह बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि भगवान के पास असीम शक्ति है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)