सर्प-ह्रद : पुरुष-सार-निपात-वेग-
संक,भोभितोरग-विषोच्छ्वसिताम्बु-राशि:
परूयक-प्लुतो विष-कषाय-बिभीषर् -
धात्रं धनु: -शतं अनंत-बलस्य कि तत
“जब भगवान ने सर्प की झील में प्रवेश किया, तो वहाँ के सर्प अत्यधिक उत्तेजित हो गए और जोर-जोर से साँस लेना शुरू कर दिया, जिससे वह और भी ज़हरीली हो गई। झील में भगवान के प्रवेश के वेग ने उसके चारों ओर पानी बहने से उसमे उफान भर दिया, और जहरीली, भयावह लहरों ने आसपास की भूमि को सौ धनुष की दूरी तक भर दिया। हालाँकि, यह बिल्कुल भी आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि भगवान के पास असीम शक्ति है।"
