श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 219
 
 
श्लोक  2.6.219 
अहो स्वामिन् गभीरो ’यं
दुस्तर्को महताम् अपि
गाढ-प्रेम-रसावेश-
स्वभाव-महिमाद्भुतः
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! यह आश्चर्य की बात है कि ये भक्तगण किस प्रकार विशुद्ध प्रेम के अथाह रस में तल्लीन हैं। उनकी भाव-दशा का उदात्त स्वरूप बड़े-बड़े ऋषियों के लिए भी समझ से परे है।
 
O Lord! It is astonishing how these devotees are immersed in the deepest bliss of pure love. The sublime nature of their emotional state is beyond the comprehension of even the greatest sages.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)