श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 218
 
 
श्लोक  2.6.218 
प्रत्य्-एकं चिन्तयन्त्य् एवम्
अहो किं भविता कियत्
सौभाग्यं मम येन स्यां
कृष्णस्याधम-दास्य् अपि
 
 
अनुवाद
उनमें से प्रत्येक सोचती है, “ओह, मुझे कब इतना सौभाग्य प्राप्त होगा कि मैं कृष्ण की सबसे छोटी दासी भी बन सकूँ?”
 
Each of them thinks, “Oh, when will I be so fortunate that I can become even the smallest maidservant of Krishna?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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