श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 218
 
 
श्लोक  2.6.218 
प्रत्य्-एकं चिन्तयन्त्य् एवम्
अहो किं भविता कियत्
सौभाग्यं मम येन स्यां
कृष्णस्याधम-दास्य् अपि
 
 
अनुवाद
उनमें से प्रत्येक सोचती है, “ओह, मुझे कब इतना सौभाग्य प्राप्त होगा कि मैं कृष्ण की सबसे छोटी दासी भी बन सकूँ?”
 
Each of them thinks, “Oh, when will I be so fortunate that I can become even the smallest maidservant of Krishna?”
तात्पर्य
गोलोक की प्रत्येक युवा गोपी की महत्वाकांक्षा होती है कि किसी दिन उसे कृष्ण की सेवा करने का सौभाग्य मिले, भले ही वह सबसे निचले पद पर ही क्यों न हो। ऐसी अत्यंत विनम्रता उन्हें युवा गोपों, पुरुष ग्वालों से अलग करती है, जो खुद को कृष्ण का प्रिय मानते हैं और खुद को बहुत भाग्यशाली समझते हैं। गोप अक्सर कृष्ण के लिए अपने अति उन्नत प्रेम की प्रकृति के कारण कई कारणों से खुद से असंतुष्ट महसूस करते हैं। फिर वे कृष्ण के बेहतर सेवक बनने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। हालाँकि, गोपियों का प्रेम पूर्णता के उच्चतम स्तर पर है। वे कभी भी खुद से संतुष्ट नहीं होती हैं, क्योंकि उनकी विनम्रता पूर्ण होती है। उनमें से प्रत्येक खुद को कृष्ण की सबसे खराब दासी मानती है, उसकी एकमात्र आशा यह है कि किसी तरह उसे अपनी अयोग्यताओं के बावजूद उसकी सेवा जारी रखने की अनुमति दे दी जाए। इस तरह गोपों और गोपियों के मिजाज अलग होते हैं। श्री वैकुंठ में नारायण के भक्तों को भी कभी नहीं लगता कि उन्हें भगवान के चरण कमलों की पूजा के परमानंद का भरपूर अनुभव हो गया है। लेकिन उनमें से हर कोई मानता है कि सर्वशक्तिमान भगवान सभी पर बिना किसी भेदभाव के पूर्ण रूप से दयालु हैं। गोलोक-वासी इस तरह नहीं सोच सकते।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)