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श्लोक 2.6.215  |
यया युक्ति-शतैर् व्यक्तं
मादृशैर् अनुमन्यते
आभिः समो न को ’प्य् अन्य-
त्रत्यो ’प्य् अस्य प्रियो जनः |
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| अनुवाद |
| यह सैकड़ों तर्कों का प्रमाण है, जिनके द्वारा मेरे जैसे व्यक्ति यह समझ सकते हैं कि उस धाम में या अन्यत्र, गोपियों के समान उन्हें कोई भी प्रिय नहीं है। |
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| This is the proof of hundreds of arguments by which a person like me can understand that in that abode or elsewhere, there is no one dearer to Him than the Gopis. |
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