श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 214
 
 
श्लोक  2.6.214 
गोपीषु च सदा तासु
प्रत्य्-एकं कोटि-कोटिषु
परा प्रीतिः कृपासक्तिर्
अपि सा तस्य वीक्ष्यते
 
 
अनुवाद
फिर भी, लाखों-करोड़ों गोपियों में से प्रत्येक के प्रति कृष्ण सदैव स्पष्ट रूप से सर्वाधिक लगाव, करुणा और प्रेम प्रदर्शित करते हैं।
 
Yet, Krishna always clearly displays the greatest affection, compassion and love for each of the millions of gopis.
तात्पर्य
इस संदर्भ में, प्रीति ("स्नेह") का अर्थ है "शुद्ध उत्तापपूर्ण प्रेम", कृपा ("दया") का अर्थ है "इस प्रेम को प्रदर्शित करने वाले संकेत", और आसक्ति ("लगाव") का अर्थ है "अनन्य समर्पण"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)