सरूप ने पहले ही गोलोक की महिमा के अपने वर्णन में इन संदेहों का उत्तर दिया है। उन्होंने संक्षेप में उन शिक्षाओं को दोहराया जो नारद ने उन्हें पहले, वैकुण्ठ में गोलोक के अद्वितीय कद के बारे में दी थीं और अपनी टिप्पणियों के साथ उन शिक्षाओं को स्पष्ट किया। यदि मथुरा ब्राह्मण को और भी अधिक शास्त्रीय समर्थन चाहिए है, तो वह पद्म पुराण (उत्तर-खंड) और पंचरात्र के विभिन्न कथनों को देख सकता है।
श्री बृहद-भागवतामृत के आगामी छंदों में, श्री सरूप गोलोक में अपने निजी सहयोगियों और उपकरणों के साथ साकार होने वाले ईश्वर के व्यक्तित्व के अतींद्रिय लीलाओं के बारे में अधिक बताएंगे। तब ब्राह्मण को सूचित किया जाएगा कि कैसे कंस और अन्य दानव कृष्ण के निवास में रहते हैं। संक्षेप में, कंस और कृष्ण के अन्य शत्रु भी कृष्ण के अनादि लीलाओं में शामिल होते हैं, उसी कारण के लिए जिस कारण से कृष्ण के वैकुण्ठ सहयोगी अपनी आध्यात्मिक पहचान में उनके साथ जुड़ते हैं, अर्थात कृष्ण के आनंद को बढ़ाना। कृष्ण के निवास में गाड़ियाँ और अन्य स्पष्ट रूप से निर्जीव वस्तुएँ वास्तव में जीवित हैं और पूरी तरह से आध्यात्मिक सच्चिदानंद हैं। श्री बृहद-भागवतामृत के विवरणों के अनुसार, कृष्ण के निवास गोलोक में सब कुछ वैकुण्ठ की तरह ही अतींद्रिय है। इस निष्कर्ष का समर्थन करने के लिए शास्त्रीय प्रमाण बाद में उद्धृत किए जाएंगे।
