श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 199
 
 
श्लोक  2.6.199 
अयोध्या-द्वारवत्य्-आदि-
वासिनां च ततो ’पि तत्
उक्तं रस-विशेषेण
केनचित् केनचिन् महत्
 
 
अनुवाद
तथा अयोध्या और द्वारका जैसे स्थानों में निवास करने वाली आत्माओं का सुख कुछ विशेष रुचियों के कारण और भी अधिक बताया गया है।
 
And the happiness of the souls residing in places like Ayodhya and Dwarka is said to be even greater due to some special interests.
तात्पर्य
हमने पहले ही ये सुना है कि अयोद्धा और द्वाराका में परम भगवान के भक्त उनकी सेवा विशेष आत्मीयता के साथ करते हैं। श्री रघुनाथ के चरण-कमलों के शाश्वत सेवक वैकुण्ठ में श्री नारायण के सहयोगियों से अधिक खुश हैं; और द्वारका में श्री यादवेंद्र के शाश्वत रिश्तेदार इससे भी अधिक खुश हैं। अयोध्या के भक्तों को भगवान की अनन्त व्यक्तिगत सेवा का सौभाग्य प्राप्त है, लेकिन द्वारका के भक्त, कृष्ण के साथ दोस्ती के रस का स्वाद चखने के हकदार होने के कारण, और भी अधिक विशेषाधिकार प्राप्त हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)