श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 191
 
 
श्लोक  2.6.191 
तत्-तद्-विशेषो निर्वाच्यो
’नन्त-शक्त्यापि नापरः
महार्ति-जनके तस्मिन्
को वा धीमान् प्रवर्तते
 
 
अनुवाद
असीमित शक्ति वाला व्यक्ति भी उन व्यवहारों का विस्तार से वर्णन नहीं कर सकता। लेकिन कोई बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा करने की कोशिश भी क्यों करेगा? इससे तो केवल घोर दुःख ही उत्पन्न होगा।
 
Even a person with unlimited power cannot describe those behaviors in detail. But why would any intelligent person even try to do so? It would only lead to immense suffering.
तात्पर्य
मथुरा के ब्राह्मण कृष्ण के दिन के हर बारे में सुनने के लिए उत्सुक हो सकते हैं—अपनी माँ के उन्हें जगाने के समय से शाम को घर लौटने के समय तक—लेकिन सारूप कहते हैं कि अनंत शेष के बराबर ही कोई इस सबको बताने की माँग को संतुष्ट कर सकता है। लेकिन ब्राह्मण ने जवाब दिया होगा कि भगवान को इन् शब्दों के साथ संबोधित किया गया है: माया-बलैना भवतापि निगूढ्यमानम पश्यंति केचित्: "कुछ लोग देख सकते हैं जो आप अपनी माया की शक्ति से छिपा कर रखते हैं।" (स्तोत्र-रत्न 13) और ब्राह्मण को यह जिद हो सकती है कि श्री सारूप वास्तव में भगवान के एक महान भक्त हैं और इसलिए कुछ भी करने में सक्षम हैं।

तब सारूप कह सकते हैं, "लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि वे घटनाएँ अनंत हैं।"

"तब कृपया कम से कम उनमें से कुछ का विस्तार से वर्णन करें," ब्राह्मण आग्रह कर सकते हैं।

अंत में सारूप ने उत्तर दिया, "नहीं, एक बुद्धिमान व्यक्ति को वह नहीं बोलना चाहिए जिससे पूरे विश्व को दुख मिले। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह बुद्धिमान नहीं है।" दरअसल, बदारायण व्यास के पुत्र ने भी श्रीमद्-भागवतम में यें तथ्य- व्रज के निवासियों के कृष्ण से रोज वियोग के बारे में विस्तार से नहीं बताए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)