श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.6.190 
तास् तु तस्य विलासांस् तान्
गायन्त्यो विविशुर् व्रजम्
दिनम् आरेभिरे नेतुं
ध्यायन्त्यस् तस्य सङ्गमम्
 
 
अनुवाद
गोपियाँ कृष्ण की लीलाओं का गान करते हुए गाँव में प्रवेश कर गईं, जहाँ उन्होंने दिन का आरम्भ कृष्ण की संगति के विचारों में मग्न होकर किया।
 
The gopis entered the village singing the pastimes of Krishna, where they began the day absorbed in thoughts of Krishna's company.
तात्पर्य
गोपियाँ कृष्ण की सबसे बड़ी भक्त हैं, श्री नंद और दूसरे बड़े चरवाहे पुरुषों और महिलाओं से भी कहीं अधिक तन्मय होकर उन्होंने खुद को उनके प्रति समर्पित कर दिया है। गोपियाँ पूरा दिन रासलीला और कृष्ण के साथ बिताए अन्य समयों के बारे में संकीर्तन गाते हुए बिताती थीं। उन्हें याद आता कि उन्होंने उन पलों का कितना आनंद लिया था और वे जल्दी ही फिर से उनके साथ समय बिताने के लिए उत्सुक थीं।

गोपियों के कुछ गीत श्रीमद भागवतम के दसवें खंड, पैंतीसवें अध्याय में दर्ज हैं:

वाम-बाहु-कृत-वाम-कपोलो

वल्गिता-भ्रुर् अधरार्पित-वेणुम्

कोमलङ्गुलीभिर् आश्रित-मार्गम्

गोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः

व्योम-यान-वनितः सह सिद्धैर्

विस्मितास् तद उपाधर्य्य स-लज्जाः

काम-मार्गण-समर्पित-चित्ताः

कश्मलम् ययुर् अपस्मृत-नीव्याः

"जब मुकुन्द अपने द्वारा अपने होठों पर रखी हुई बाँसुरी बजाते हैं और उसकी छेदों को अपनी कोमल अंगुलियों से बंद करते हैं, वे अपने बाएँ गाल को अपने बाएँ हाथ पर टिकाते हैं और अपनी भौंहों को झुमाते हैं। उस समय अपने पतियों, सिद्धों के साथ आकाश में उड़ान भर रही अप्सराएँ विस्मित हो जाती हैं। जैसे-जैसे वे स्त्रियाँ इसे सुनती हैं, उन्हें शर्मिंदगी होती है कि उनके मन वासनाओं की पूर्ति के लिए आत्मसमर्पण कर बैठे हैं, और वे परेशान हो जाती हैं कि उन्होंने अपनी पेटी खोल दी है।" (भागवतम 10.35.2-3)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)