|
| |
| |
श्लोक 2.6.171  |
भो वत्स दुर्गमे ’रण्ये
न गन्तव्यं विदूरतः
स-कण्टक-वनान्तश् च
प्रवेष्टव्यं कदापि न |
| |
| |
| अनुवाद |
| "मेरे प्यारे बच्चे, अभेद्य जंगल में बहुत दूर मत जाओ। और कभी भी उस जंगल में मत जाओ जहाँ काँटे हों!" |
| |
| "My dear child, don't go too far into the impenetrable forest. And never go into the forest where there are thorns!" |
| ✨ ai-generated |
| |
|