श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 171
 
 
श्लोक  2.6.171 
भो वत्स दुर्गमे ’रण्ये
न गन्तव्यं विदूरतः
स-कण्टक-वनान्तश् च
प्रवेष्टव्यं कदापि न
 
 
अनुवाद
"मेरे प्यारे बच्चे, अभेद्य जंगल में बहुत दूर मत जाओ। और कभी भी उस जंगल में मत जाओ जहाँ काँटे हों!"
 
"My dear child, don't go too far into the impenetrable forest. And never go into the forest where there are thorns!"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)