| श्री बृहत् भागवतामृत » खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य » अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति) » श्लोक 138 |
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| | | | श्लोक 2.6.138  | निरङ्क-पूर्णेन्दु-समैस् तथापरैर्
मृदूपधानैर् युतम् अस्ति यत् ततम्
अनर्घ्य-रत्नाचित-काञ्चनोल्लसल्-
ललाम-पल्यङ्क-वरे महा-प्रभे | | | | | | अनुवाद | | उस विशाल पलंग पर मुलायम तकिए थे, कुछ बेदाग़ पूर्णिमा जैसे, तो कुछ तरह-तरह के। और वह एक चमकदार पलंग पर पड़ा था जो चमकते हुए सोने और अमूल्य रत्नों से सुसज्जित था। | | | | The huge bed had soft pillows, some like the immaculate full moon, others a variety of colors. And he lay on a dazzling bed, decorated with glittering gold and precious gems. | | ✨ ai-generated | | |
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