श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  2.6.125 
सा चर्वणोद्यद्-अरुणाधर-चारु-जिह्वा
गण्ड-स्थलानन-सरोज-विलास-भङ्गी
भ्रू-चाप-लोचन-सरोरुह-नर्तन-श्री-
विद्योतिता न वचसा मनसापि गम्या
 
 
अनुवाद
न तो शब्द और न ही मन इस बात की कल्पना कर सकते हैं कि किस प्रकार कृष्ण की प्यारी जीभ, उनके चबाते समय उनके गुलाबी ऊपरी होंठ तक उठती थी, उनके कमल के मुख के गालों के भीतर घूमती थी, उनका मुख उनके कमल के नेत्रों और धनुषाकार भौंहों के सुंदर नृत्य से दैदीप्यमान था।
 
Neither words nor mind can imagine how Krishna's sweet tongue, rising to His rosy upper lip as He chewed, moved within the cheeks of His lotus face, His face resplendent with the beautiful dance of His lotus eyes and arched eyebrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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