श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  2.6.118 
मात्रा कदाचित् पित्रा च
भ्रात्रापि क्रमशो मुखे
समर्प्यमाणं यत्नेन
कवलं लीलयाददत्
 
 
अनुवाद
एक समय उनकी मां, उनके पिता और उनके भाई ने बारी-बारी से उनके मुंह में भोजन के निवाले डाले, जिन्हें उन्होंने खेल-खेल में स्वीकार कर लिया।
 
At one point, his mother, his father, and his brother took turns putting morsels of food into his mouth, which he accepted playfully.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)