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श्लोक 2.6.102  |
एवम् अन्योन्य-सौहार्द-
भर-प्रकटनेन हि
वेशः समाप्तिं नायाति
लोप्यमानस् तथा मुहुः |
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| अनुवाद |
| इन सब प्रेम-प्रसंगों के बीच, सजावट कभी पूरी नहीं हो पाई। गोपियों को बार-बार अपने प्रयास मिटाने पड़े। |
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| Amidst all this lovemaking, the decorations were never completed. The gopis had to repeatedly erase their efforts. |
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