श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.5.97 
अतो वैकुण्ठ-नाथस्य
वैकुण्ठे ’पि कदाचन
दर्शनं नैव लभ्येत
भवताप्य् अन्वभावि तत्
 
 
अनुवाद
और इसीलिए कभी-कभी वैकुंठ के स्वामी वैकुंठ में दिखाई नहीं देते। यह आपने स्वयं ही जान लिया है।
 
And that is why sometimes the Lord of Vaikuntha is not visible in Vaikuntha. You have discovered this yourself.
तात्पर्य
कभी-कभी भगवान नारायण अपने निवास से भौतिक दुनिया में आने के लिए निकल जाते हैं, जैसा कि गोपा-कुमार ने वैकुंठ में रहने के दौरान पाया था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)