श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  2.5.91 
शृणु कण्डूयते जिह्वा
ममेयं चपला सखे
रत्नम् उद्घाटयाम्य् अद्य
हृन्-मञ्जुषार्पितं चिरात्
 
 
अनुवाद
सुनो, प्यारे दोस्त। मेरी लड़खड़ाती ज़बान बोलने को मचल रही है। अब मैं उस रत्न को उजागर करूँगा जो मैंने बहुत समय से अपने हृदय के खजाने में रखा है।
 
Listen, dear friend. My faltering tongue is yearning to speak. Now I will reveal the gem I have long treasured in the recesses of my heart.
तात्पर्य
नारद अपनी ज़बान को बहुत बोल्ड मानते हैं, लेकिन असल में कृष्ण का गुणगान करने की यह इच्छा एक सराहनीय गुण है, चाहे वह उनमें हो या किसी और में। नारद, किसी भी स्थिति में, अपनी ज़बान को और अधिक प्रकट करने से नहीं रोक पाते हैं, और इसलिए वह कुछ ऐसा वर्णन करने जा रहे हैं जिसे उन्होंने अपने दिल में लंबे समय तक छिपा कर रखा है। उन्होंने इस बारे में पहले कभी किसी से चर्चा नहीं की है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)