श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  2.5.85 
व्यवहारो ’स्य तेषां च
सो ’न्योन्यं प्रेम-वर्धनः
वैकुण्ठे परमैश्वर्य-
पदे न किल सम्भवेत्
 
 
अनुवाद
गोलोक में भगवान और उनके भक्तों के बीच का व्यवहार उनके आपसी प्रेम को इस प्रकार बढ़ाता है, जो परम ऐश्वर्य के धाम वैकुंठ में संभव नहीं है।
 
The interaction between the Lord and His devotees in Goloka enhances their mutual love in a way that is not possible in Vaikuntha, the abode of supreme opulence.
तात्पर्य
नारद ने कहा है कि गोलोक वैकुंठ से बहुत दूर स्थित है, और अब वह बताते हैं क्यों। सर्वोच्च भगवान वैकुंठ में अपने भक्तों के साथ उसी तरह के व्यवहार से नहीं कर सकते जैसे गोलोक में करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)