इस तरह से व्रज का प्रेम अद्भुत और मधुर है, जो अपने आप में आध्यात्मिक दुनिया की राजसी वैभव और भौतिक दुनिया की सरल मिठास को जोड़ता है। व्रज के भक्तों के पास अलौकिक वैभव है, और साथ ही वे सबसे सरल लोग हैं। अपनी समृद्ध शक्ति से वे कुशलतापूर्वक भगवान के अनगिनत लीलाओं के सभी विभिन्न पहलुओं को समझने और उसमें भाग लेने में सक्षम हैं। और आम लोगों की तरह, व्रज-वासियों, उनके जीवन के वृत्तांतों से यह विदित है, भोजन और पेय पदार्थों, मित्रों और रिश्तेदारों की संगति आदि का आनंद लेते हैं। और यहाँ तक कि भगवान का व्यक्तित्व भी, यद्यपि अपना वैभव दिखाता है, इसे एक साधारण बच्चे के लीलाओं में दिखाता है। उदाहरण के लिए, अपने शैशव के लीलों के दौरान, कृष्ण ने पूतना के स्तन से दूध पिया और उस शक्तिशाली चुड़ैल से जीवन वायु को चूस लिया, जिसने कभी संदेह नहीं किया था कि वह ऐसा कर सकता है। और अनगिनत अन्य तरीकों से भी, भगवान, यद्यपि अपना वैभव दिखाते हैं, एक साधारण इंसान की तरह कार्य करते हैं। जैसे-जैसे बृहद- भागवतामृत का वर्णन जारी है, यह सब पूरी तरह से समझाया जाएगा।
ऐसे विचारों को ध्यान में रखते हुए, श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा:
एवं निगूढात्मा-गतिः स्व-मायया
गोपाऽत्मजत्वं चरितैर्विडम्बयन
रेमे रमा-लालित-पाद-पल्लवो
ग्राम्यैः समं ग्राम्यवदीश-चेष्टितः
"इस तरह से परम भगवान्, जिनके कोमल कमल चरण स्वयं भाग्य की देवी द्वारा रखे गए हैं, ने अपनी आंतरिक शक्ति द्वारा अपने अलौकिक वैभव को छिपाया और एक ग्वाले के पुत्र की तरह काम किया। फिर भी अन्य ग्रामीण निवासियों की संगति में एक गाँव के लड़के की तरह आनंद लेते हुए भी, वे अक्सर केवल ईश्वर द्वारा ही किए जा सकने वाले कार्य प्रदर्शित करते थे। " (भागवतम 10.15.19)
दसवें कांड के इस श्लोक में 'विडम्बयन' शब्द "अनुकरण करना" के लिए क्रिया विडम्ब ("अनुकरण करना") का एक रूप है। हालाँकि, यह कृदंत रूप कभी-कभी "के उद्देश्य से" भी अर्थ कर सकता है, जैसा कि यहाँ करता है- "अनुकरण करने के उद्देश्य से"। इस प्रकार इस श्लोक का अर्थ यह किया जा सकता है कि कृष्ण एक ग्वाले लड़के (गोपाऽत्मजत्वम्) की प्रकृति की नकल करने या ग्रहण करने के उद्देश्य से अपनी आधिपत्य (निगूढाऽत्मा-गतिः) को अपनी विशेष शक्तियों (स्व-मायया) द्वारा छिपाते हैं। वह अपनी ईश्वरीय शक्तियों (आत्मा-गति) को छिपाता है ताकि वह एक सामान्य इंसान की तरह काम कर सके, लेकिन उसकी पूर्ण शक्ति अभी भी उसके द्वारा अपने प्रत्येक लीलाओं में प्रदर्शित की गई पूर्ण मधुरता की चरम सीमा में विवेकी है। उन्हें अपनी पत्नी की सुप्रीम देवी द्वारा अपने पैरों की मालिश करवाने में आनंद मिलता है, और वह केवल वह काम करते हैं जो केवल ईश्वर ही कर सकते हैं (ईश-चेष्टितः), और फिर भी वह अन्य ग्रामीणों की संगति में एक साधारण गाँव के लड़के (ग्राम्य-वत) की तरह खेलता है।
