श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  2.5.84 
लोकानुगापि सान्योन्यं
प्रियतातीत-लौकिका
मधुरात्य्-अद्भुतैश्वर्य-
लौकिकत्व-विमिश्रिता
 
 
अनुवाद
हालाँकि वह पारस्परिक स्नेह साधारण दुनिया के तौर-तरीकों का अनुसरण करता प्रतीत होता है, पर वह दुनिया से परे है। इसमें आत्मीय मधुरता, अद्भुत ऐश्वर्य और सांसारिक सादगी का सम्मिश्रण है।
 
Although that mutual affection appears to follow the patterns of the ordinary world, it transcends this world. It blends intimate sweetness, wondrous opulence, and earthly simplicity.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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